7 th question aashaya spast karein-

you have provided the answer that it is asanskriti.

Here writer is directly pointing about the misuse of nuclear weapons, but when it was invented the inventor doesnot have an idea about it's misuse. According to book the inventor is 'sanskrit' and it's use is 'sabhayata'. The weapon can also be used to protect earth by destroying any falling metroid in air .we call the inventor of vehicle a 'sanskrit' man but vechicle cause a lot of pollution thus lead to global warming.The cause is that the inventor of vehicle was not aware that it will cause a lot of pollution later on.I think the answer of the question is that----yes we call a 'sanskrit'.since it is not used correctly so it is 'aashabhya'.

नमस्कार मित्र।

जिस प्रश्न के बारे में आप बात कर रहे हैं, वह स्वयं में प्रश्न भी है और उत्तर भी। प्रश्न पूछने वाले ने

आपको यह भी बताया है कि प्रश्न क्या है और दो विकल्पों के माध्यम से आपको यह भी बताया है कि इन दो विकल्पों में से इसका उत्तर एक है। तो यह प्रश्न ही नहीं उठता कि इसका उत्तर जो आपने दिया है वह होना चाहिए।


देखिए कैसे-


नीचे दिया रेखांकित वाक्य प्रश्न है और गहरे किए गए शब्द दो विकल्प हैं। आपको इनमें से एक विकल्प चुनना है।


मानव की जो योग्यता उससे आत्म-विनाश के साधनों का आविष्कार कराती है, हम उसे उसकी संस्कृति कहें या असंस्कृति?


रही बात जो आपने कही है, तो उसका उत्तर इस प्रकार है-

आपका कहना है कि हथियार का निर्माण करने वाला आविष्कारक यह नहीं जानता था कि इसका दुरूपयोग होगा, तो आप यह गलत समझते हैं। जब किसी प्राणघातक हथियार का आविष्कार किया जाता है, तो आविष्कारक को भली-भांति से ज्ञात होता है कि वह कितना और किस हद तक मानव सभ्यता के लिए घातक हो सकता है। तलवार और बंदूक तक बात समझ में आती है कि यह आत्मरक्षा के लिए थे। परन्तु बम, स्टेनगन, सबसे बड़ा घातक परमाणु बम और आजकल जिस जैविक हथियार की बात की जा रही है, क्या उनको बनाने वाले नहीं जानते कि ये कितने घातक हैं? परन्तु इनका निरंतर आविष्कार हो रहा है। फिर यह नहीं कहा जा सकता कि आविष्कारक को नहीं पता होता कि इसका दुरूपयोग नहीं होता। जिनका उद्देश्य पैसा कमाना हो, उन वैज्ञानिकों के लिए इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह कितने लोगों को मारती है। आरंभ से ही हथियार आत्मरक्षा के स्थान पर कम और दूसरों पर बलपूर्वक शासन करने के लिए अधिक प्रयोग में लाए गए हैं।


अब बात आती है पहिए की। तो इस बात को हम अवश्य कह सकते हैं कि यह अज्ञानता वश हुआ है। पहिए का निर्माण करने वाले ने उस समय लकड़ी से पहिया बनाया जो वातावरण के लिए घातक नहीं था। उस समय की आबादी के अनुकूल पेड़ भी बहुत बहुतायत में पाए जाते थे। धीरे-धीरे मानव सभ्यता विकसित हुई। फिर पेट्रोल और डीजल से गाड़ियाँ चलने लगी। उसके भी वर्षों बाद मनुष्य को पता चला कि यह तो वातावरण के लिए घातक है। परन्तु इस तथ्य का पता चलते ही कितने लोगों ने पेड़ों को दोबारा उगाना आरंभ किया। बिजली से और सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों का आविष्कार किया जा रहा है। ये अपनी गलती को सुधारने का प्रयास है। परन्तु हथियारों के विषय में इस प्रकार की बातें मात्र सुनाई देती हैं, होता कुछ नहीं। किसी भी देश को देख लो सबके पास एक-से-एक घातक हथियार रखें हैं। उनसे भी घातक हथियारों का निर्माण हो रहा है। इसे आप क्या कहेगें। जब वाहनों का निर्माण हुआ तो उसके लाभ ही थे। इसके लिए यदि हम मिलजुलकर उपाय करें, तो छुटकारा पा सकते हैं। परन्तु हथियारों के दुष्परिणाम कुछ क्षणों में पता चल जाते हैं और इनसे छुटकारा पाना भी संभव नहीं होता। अमेरिका जानता था कि जापान के जिन दो शहरों पर वह परमाणु हथियार का प्रयोग कर रहा है, उसके घातक परिणाम उसकी सोच से कई हज़ार गुना घातक हो सकते हैं। फिर भी उसने युद्ध के मैदान के स्थान पर दो शहरों पर परमाणु बम फैंका। उसका परिणाम कुछ क्षणों में पता चल गया और आज भी उसके घातक परिणाम नई उत्पन्न हुई पीढ़ियों में देखे जा सकते हैं। इसमें हम मिल-जुलकर भी कुछ नहीं कर सकते हैं। इसलिए इन दोनों की तुलना करना उचित नहीं है। ये तो सीधे-सीधे मानव सभ्यता को जड़ से उखाड़ने वाली बात है।

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Dhanyavaad! I Got the Point.

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