another poem on kathputli in hindi

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kathputli gusse se ubli

boli ye dhage kyun hai mere peeche

inhe tod do mujhe mere paavon par chod do

sunkar boli aur aur kathputliyan ki ha

bahut din huve hame apne man ke chand chue

magar pehli kathputli sochne lagi

ye kaisi ichaa mere man me jagi

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