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कवयित्री के अनुसार मानव जीवन मिट्टी के एक कच्चे सकोरे के सामान है, जिसमें से पानी टपक रहा है एक दिन सकोरे में रखा पानी ख़त्म हो जाएगा अर्थात जीवन समाप्त हो जाएगा। कवयित्री को यही भय हमेशा रहता है, जो उसे ईश्वर को प्राप्त नहीं करने दे रहा है
 

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