Dwivedi jee dwara stri sicha ke Samarthan main diye gaye vicharo ko apne sabdo main likhe.

मित्र !

आपका उत्तर इस प्रकार है :

द्विवेदी जी समाज को स्वावलंबी बनाने के पक्षधर थे । वे मानते थे कि एक अच्छे समाज का निर्माण करने में स्त्री और पुरुष दोनों का बराबर का योगदान होता है । वे स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देते थे परन्तु कुछ पुरातनपंथी लोग ऐसे भी थे, जो स्त्री शिक्षा के पक्ष में बिलकुल नहीं थे । द्विवेदी जी ऐसे लोगों के विचारों से लोहा लेते थे । पुरातनपंथी स्त्री शिक्षा के विरुद्ध थे । उनका कहना था कि स्त्रियों​ द्वारा अनर्थ होता है ​। द्विवेदी जी का विचार था यदि अनर्थ स्त्री द्वारा होता है, तो अनर्थ पुरुष द्वारा भी होता है ।​ उनके विद्यालय भी बंद कर देने  चाहिए । द्विवेदी जी ने व्यंग्यपूर्ण उत्तर देकर अपने विचारों से समाज को स्त्री शिक्षा के प्रति जागरूक किया । उनका कहना था `स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट` । इस तरह वे अपने व्यंग्यपूर्ण विचार से उन लोगों को निशाना बनाते थे, जो छोटी सोच और अपनी सड़ गई परम्पराओं से स्त्रियों को अनपढ़ बना कर रखना चाहते थे । ​ पुराने ज़माने में स्त्री शिक्षा पर प्रतिबन्ध जैसे कुतर्क का जवाब अपने तर्कपूर्ण उत्तर से देते थे । अपने तर्कों और विचारों से उन्होंने ऐसे कुतर्कों को अनुचित और गलत प्रमाणित किया और कहा कि स्त्री शिक्षा के बाद ही हमारे समाज की प्रगति निश्चित है ।

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