ek kahani yeh bhi ---paath par alochnatmak tiprini dijiye !
reply soon !!!

नमस्कार मित्र,

'एक कहानी यह भी' स्वयं में अच्छी और सशक्त कहानी है। परन्तु कहीं-कहीं लेखिका कुछ पात्रों के साथ न्याय करती नज़र नहीं आती। जैसे कि उनकी माँ। वह स्वयं इस बात को स्वीकार करती हैं कि उनकी माँ का सारा जीवन पति की सेवा और बच्चों के लालन-पालन में व्यतीत हुआ। उन्होंने स्वयं के अस्तित्व को उनके जीवन के लिए होम कर दिया। परन्तु लेखिका के लिए उनकी माँ का चरित्र गौण रहा है। उनके अनुसार उनकी माँ का व्यक्तित्व प्रेरणा लेने योग्य नहीं है। इस तरह से वह उन सभी माताओं के अस्तित्व को नकारती हुई प्रतीत होती हैं, जो घर के लिए अपने जीवन की आहुति दे देती हैं। जिनके कारण हम स्वयं नई ऊचाइयाँ पाते हैं, उन्हें अपनी सफलता के श्रेय से बड़ी सरलता से बाहर कर देते हैं। हम तभी सफल हो पाते हैं, जब वह हमें घर की ज़िम्मेदारियों से मुक्त कर देती हैं। उनके स्वयं के पिता शब्दकोश के निर्माता थे। बिना पत्नी के योगदान के यह कार्य संभव नहीं हो सकता था। 

इस कहानी में लेखिका स्वयं उलझी हुई नज़र आती हैं। वह एक तरफ स्वयं के दृढ़ व्यक्तित्व को उजागर करती है परन्तु कहीं वह स्वयं को हीनभावनाओं से घिरा पाती हैं। कहानी पढ़कर समझ ही नहीं आता कि आखिर लेखिका पाठकों को क्या बताना चाहती है। कहानी का उद्देश्य समझ नहीं आता है। कहानी को लेखिका स्वयं के आसपास इतना केंद्रित कर देती हैं कि कई महत्वपूर्ण तथ्य पीछे छूट जाते हैं। स्वतंत्रता के संग्राम में देश की सामाजिक और राजनैतिक हलचल कहानी में नाम मात्र के लिए हैं।

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Apka bahut bahut dhanyavaad ma'am :)

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