feri walon ke yogdaan evam samasya par ek sampadkiy lekh teyaar kijiye.....

मित्र
आजकल गली-मौहल्लों में फेरी वाले कम दिखाई देते हैं। मॉल संस्कृति ने इनके जीवन पर खासा प्रभाव डाला है। पहले यही गली-मौहल्लों की जान होते हैं। इनकी मधुर आवाजें जीवन में रस घोलती थी। लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से और उच्च तकनीकी दुकानों के आने के कारण से इनका आना कम हो गया है। फेरी वालों की जिंदगी बहुत अच्छी नहीं होती है। वह थोड़ी सी जमापूंजी के द्वारा वस्तुएँ खरीदता है और उसे थोड़े से लाभ के साथ बेच देता है। कभी उसकी वस्तुएँ बिक जाती हैं। परन्तु जिस दिन नहीं बिकती हैं, तो उसे कठिनाई होती है। क्योंकि रोज़ की कमाई के आधार पर ही उसका जीवन निर्भर होता है। मौसम कैसा भी हो उसे फैरी के लिए निकलना पड़ता है। यदि वह एक दिन भी  फेरी नहीं लगता तो उसे उस दिन भोजन मिलना कठिन हो जाता है। कड़कती धूप, मूसलाधार बरसात और ठिठुरती सर्दी में भी  वह फैरी लेकर चल पड़ता है। उसे कभी आराम नहीं मिलता। यही कारण है इनका जीवन कठिनाइयों से भरा होता है।

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