पाठ के आधार नीलकंठ के 'सेनापति और संरक्षक' रूप का वर्णन अपने शब्दों में किजिए-

नीलकंठ एक सजग सचेत मुखिया था। जिस तरह घर का एक मुखिया अपने कर्त्तव्यों के प्रति सचेत सजग रहता है। उसी तरह नीलकंठ अपने जालीघर के जीव-जंतुओं के लिए था। वह एक सजक सेनापति और सरंक्षक की तरह कार्य करता। सबको एकत्र करता उन्हें खाने के लिए ले जाता। जो कोई गड़बड़ करता, तो अपनी चोंच से प्रहार करके उसे सज़ा देता। एक दिन जब खरगोश के शावक साथ - खेल करते हुए उछलकूद कर रहे थे तो जाली के भीतर कहीं से एक साँप घुस आया। उसको देखकर सब पशु - पक्षी तो भाग गए पर सिर्फएक खरगोश का शावक भाग पाया और साँप उसे निगलने का प्रयास करने लगा। खरगोश का शावक उसकी कैद से छूटने के प्रयास में क्रंदन करने लगा। नीलकंठ ने जैसे ही उस क्रंदन को सुना वह पेड़ की शाखा से कूदकर साँप के समक्ष खड़ा हुआ और अपने पंजों से साँप के फन को दबाया और चोंच के प्रहार से दो ही पल में उसके दो टुकड़े कर दिए। इस तरह उसने शावक को साँप की पकड़ से बचा लिया। घायल खरगोश के बच्चे को लेकर सारी रात बैठकर उसको ऊष्मा देता रहा। इससे पता चलता है कि वह जीव-जंतुओं का सेनापति तथा सरंक्षक था।

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