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खानपान की मिश्रित संस्कृति से तात्पर्य है कि आज भारतीय रसोई में अपने गाँव/संस्कृति की ही नहीं अपितु पूरे भारत के खानपान की खुशबू आती है। वह आज एक स्थान, जाति व देश न बनकर पूरे भारत का परिचय कराती है। आप एक दक्षिण भारतीय परिवार के घर में सांभर, डोसा के साथ पिजा, छोले, राजमा, दाल, चाईनीज पता नहीं कितने ही तरह के व्यंजन बनते हुए देख सकते हैं। वैसे ही एक उत्तर भारतीय परिवार में डोसा, पिजा इत्यादि व्यंजन बनते हुऐ देख सकते हैं। खानपान की यही संस्कृति मिश्रित संस्कृति कहलाती है। यह अनेकता में एकता का बोध कराती है। समय की मांग ने खानपान की तसवीर बदलकर रख दी है। आज लोगों के पास समय का नितान्त अभाव है। इसी अभाव के कारण जल्दी पकने वाले भोजन हमारी रसोई का हिस्सा बन रहे हैं। पहले घर में महिलाएँ घंटों मेहनत कर खाना बनाया करती थी। उनके पास उस समय पूरा समय हुआ करता था। लेकिन आज महिलाएँ भी कामकाजी हो गई हैं। समाज में हो रहे इस परिवर्तन ने खानपान में बदलाव किया है। यह बदलाव धीर-धीरे हर परिवार का हिस्सा बनता जा रहा है। 'फास्ट फ़ूड' का तात्पर्य है कि तुरंत बनने वाला भोजन। इस प्रकार के भोजन का चलन आज तेजी से बढ़ रहा है। इसके अंदर बर्गर, नूडल्स इत्यादि आते हैं। आज फ़ास्ट फुड का जमाना है। लोगों के पास समय नहीं है। समय इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि भोजन पर भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है। आज की युवा पीढ़ी ऐसे भोजन को पसंद करती है, जिसे बनाने में अधिक समय नष्ट न हो। वह जल्दी और कहीं भी खाया जा सके। इसके अंदर एक लंबी व्यंजन श्रृंखला आती है। पिज़ा, बरगर, समोसा, ब्रेड पकोड़ा, चाउमीन, इत्यादि हैं। इनमें लगने वाला शुल्क भी कम होता है। यह जल्दी बन जाते हैं। पकाने में आसान होते हैं। आसानी से हर स्थान में उपलब्ध हो जाते हैं। विविधता लिए हुए होते हैं। यही कारण हैं कि यह युवा पीढ़ी में खासे प्रचलित भी हैं। परंतु इसके नुकसान भी कम नहीं है पेट के लिए फास्ट फूड नुकसानदायक होता है, इससे हाज़मे पर असर पड़ता है। पेट की बीमारियाँ हो सकती हैं। शरीर पर वसा की मात्रा बढ़ती है। बाहर के खाने की बुरी आदत लग जाती है। बाहर लगातार खाने के कारण बजट पर भी असर पड़ता है।

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Smita das ji se anurodh h ki hindi me type kia hua prashna post krte wakt prashvachak chinh me badal rha tha islie maine apna sateek prashn bhja h ...kripya uttar den..dhanyawaad??
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