ras aur uske prakar with examples

ras- kisi chapter ya poem ko padhne ke baad jo feelings hum mehsoos karte hain ya jo bhav hame milte hain use ras kehte hain.

ras ke nimn-likhit das bhed hain.
1.shrangar ras-isme nayak-nayika soundrya prem darshaya jata hai.iske do bhed hain-sanyog aur viyog 
eg. dekhu tat basant suhava
    priya heen mori ur upjava

2.vir ras- utshah, virta ka bhav.
eg.manav samaj mein arun pada
   jal jantu beach ho varun pada
  is tarah bha-bhakta rana tha
mano sarpo (snakes) mein garun pada

3.vibhats ras- jugupsa namak sthayi bhav, ghrana ka bhav.
eg.ankhen nikal ud jate, chan bhar ud kar aa jate
    shav jheebh kheench kar kove (crows), chubhla-chubhla kar khate.

4.hasya ras- has sthayi bhav, hasi ka bhav.
eg.ek chatur nath badi hosiyar, karke shrangar vo bar-bar

5.rodra ras- krodh ki teevrata
eg.ati ras bole vachan kathor
     begi dekhao moodh na aaju
     ultaun mahi jahn lag tavraju

6.karun ras- shok ka bhav, priy ka viyog, mrityu.
eg.haye ram kase jhele ham apni lajja apna shok
     gaya hamare hi hathon se apna rashtrapita parlok.

7.adbhut ras- aascharya janak varnan, vishmay ki avstha.
eg.dekh yashoda shishu ke mukh mein, sakal vishva ki maya
   chan bhar ko veh bani achetan, hil na saki komal kaya.

8.bhyanak ras- bhay ki sthithi, bhyanak drashya
eg.baldhi bisal, vikral, jwal-jal mano
     lank lilibe ko kal rasna pasari hai.

9.shant ras- parmatma ka dhyan, pooja, varagya, stuti ka bhav
eg.mere to prabhu gir-dhar nagar, doosra na koyi

10.vatsalya ras- mamta ka bhav
eg. maiya mori main nahi makhan khayo

hope,it helps.
  • 189
Thanks
  • -7
type in hindi if possible
  • 38
thanks deepti
  • -13
There is no bhakti ras please add it also
  • -12
rasgulla ka ras kaha hai
  • -23
aur sthai bhaag
  • -9
Thank u soo much... ☺
  • -17
NICE ANSWER
  • -6
Kavya ya saahitya ko padne - sunne ya dekhne me jo anand milta h uuse ras khehete h Iske teen prakar hote h #Bhav. #vibhav aur #anubhav Bhai ke do Prakar Hote Hai
  • -14
thx it helps
  • -15
u(deepali) could have typed it in hindi so hard to translate..........
  • -25
thanks friends
  • -7
Abe owl kitab nahi padh sakta kya faltu question post karta hai
  • -10
ras kai bhad
  • -17
ras kai bhad batana
 
  • -13
रस स्थायी भाव उदाहरण चित्र शृंगार रस रति/प्रेम शृंगार रस (संभोग शृंगार)

बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय। 
सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)

वियोग शृंगार (विप्रलंभ शृंगार)

निसिदिन बरसत नयन हमारे, 
सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे॥ (सूरदास)

हास्य रस हास

 तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप। 
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता, धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)

करुण रस शोक

सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥ 
करहिं विलाप अनेक प्रकारा। परिहिं भूमि तल बारहिं बारा॥(तुलसीदास)

वीर रस उत्साह

वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो। 
सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो। 
तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं॥ (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

रौद्र रस क्रोध

श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। 
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥ 
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े। 
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े॥ (मैथिलीशरण गुप्त)

भयानक रस भय

उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी। 
चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों - सी॥ (जयशंकर प्रसाद)

वीभत्स रस जुगुप्सा/घृणा

सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत। 
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत॥ 
गीध जांघि को खोदि-खोदि कै माँस उपारत। 
स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥(भारतेन्दु)

अद्भुत रस विस्मय/आश्चर्य

अखिल भुवन चर- अचर सब, हरि मुख में लखि मातु। 
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥(सेनापति)

शांत रस शम\निर्वेद (वैराग्य\वीतराग)

मन रे तन कागद का पुतला। 
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥ (कबीर)

वात्सल्य रस वात्सल्य

किलकत कान्ह घुटरुवन आवत। 
मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत॥(सूरदास)

भक्ति रस भगवद् विषयक रति\अनुराग

राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे। 
घोर भव नीर- निधि, नाम निज नाव रे॥

 
  • 42
i couldn't und​erstand your language . sorry friend
 
  • -6
Any one plzz explain me sthayi bhav Ra's
  • -7
Any one plzz explain me sthayi bhav Ra's
  • -7
WHAT IS RAS .....BAS 
  • -7

सामान्यत: रस पीने या चखने की चीज़ है। जिस तरह रस-पान से हमारी सामान्य दैहिक पिपासा शान्त होती है, ठीक उसी तरह साहित्यिक रस-पान से हमारी आत्मिक या मानसिक पिपासा शान्त होती है। साहित्यिक रस-पान देखकर , सुनकर और पढ़कर किया जाता है। रस काव्य या साहित्य की आत्मा है।
साहित्य या काव्य को पढ़ते या सुनते समय हमें जिस आनन्द की अनुभूति होती है, उसे ही रस कहा जाता है ।

 इनकी संख्या ११ है :-- 
शृंगार , हास्य , रौद्र , करुण , वीर , अदभुत ,वीभत्स , भयानक , शान्त , वात्सल्य , भक्ति ।
 परन्तु; जिस प्रकार जिह्वा के बिना रस का आस्वादन नहीं किया जा सकता ,ठीक उसी प्रकार स्थायी भाव के बिना साहित्य के रस का आस्वादन नहीं किया जा सकता है। 
  स्थायी भाव हमारे हृदय में सदा - सर्वदा से विराजित रहने वाले भाव जिनसे हम अपनी भावनाएँ प्रकट कर सकने में समर्थ होते हैं, वे स्थाई भाव कहलाते हैं।ये भाव हमारे भीतर जन्म से होते हैं और मृत्यु पर्यन्त रहते हैं। समय और परिस्थिति के अनुरूप ये स्वत: प्रकट होते रहते हैं ; अत: इन्हें स्थायी भाव कहते हैं।

स्थायी भावों की संख्या ११ मानी गई हैं :--
 
रति, हास , क्रोध , शोक , उत्साह , विस्मय  जुगुप्सा (घृणा) , भय, 
निर्वेद (शम) , सन्तान के प्रति प्रेम , भगवान के प्रति प्रेम ।

 रस और उनके स्थायी भाव ,  देवता  तथा  रंग :--

   रस    -  स्थायी भाव -   देवता      -  रंग
 
१ - शृंगार     -   रति   -   विष्णु     -  श्याम
२ - हास्य     -   हास   -   प्रमथ     -  सित
३ - रौद्र      -  क्रोध    -  रुद्र       -   रक्त
४ - करुण     -   शोक  - यमराज      -  कपोत
५ - वीर      -  उत्साह   -  इंद्र       -   गौर
६ - अदभुत   -   विस्मय -    ब्रह्मा    -   पीत
७ - वीभत्स  - जुगुप्सा (घृणा) - महाकाल  -   नील
८ - भयानक -  भय          - कालदेव  - कृष्ण 
९ - शान्त    - निर्वेद (शम)  - नारायण  - कुंदेंदु
१० - वात्सल्य - सन्तान - प्रेम  -   --  -   --
११ - भक्ति   -  भगवत् - प्रेम   -   --  -   --
  • -4
Well done deepali
  • -8
ras ke prakar ras sthayi bhav udaharan chitr shringar ras rati/prem shringar ras (snbhog shringar)

bataras lalach lal ki, murali dhari lukay. 
saunh kare, bhaunhani hnsai, dain kahai, nati jay. (bihari)

viyog shringar (vipralnbh shringar)

nisidin barasat nayan hamare, 
sada rahati pavas ritu ham pai jab te syam sidhare॥ (sooradas)

hasy ras has

 tnboora le mnch par baithe premapratap, saj mile pndrah minat ghnta bhar alap. 
ghnta bhar alap, rag men mara gota, dhire-dhire khisak chuke the sare shrota. (kaka hatharasi)

karun ras shok

sok bikal sab rovahin rani. roopu silu balu teju bakhani॥ 
karahin vilap anek prakara. parihin bhoomi tal barahin bara॥(tulasidas)

vir ras utsah

vir tum badhe chalo, dhir tum badhe chalo. 
samane pahad ho ki sinh ki dahad ho. 
tum kabhi ruko nahin, tum kabhi jhuko nahin॥ (dvarika prasad maheshvari)

raudr ras krodh

shrikrishn ke sun vachan arjun kshobh se jalane lage. 
sab shil apana bhool kar karatal yugal malane lage॥ 
snsar dekhe ab hamare shatru ran men mrit pade. 
karate hue yah ghoshana ve ho ge uth kar khade॥ (maithilisharan gupt)

bhayanak ras bhay

udhar garajati sindhu lahariyan kutil kal ke jalon si. 
chali a rahin phen ugalati phan phailaye vyalon - si॥ (jayashnkar prasad)

vibhats ras jugupsa/ghrina

sir par baithyo kag ankh dou khat nikarat. 
khinchat jibhahin syar atihi annd ur dharat॥ 
gidh janghi ko khodi-khodi kai mans uparat. 
svan angurin kati-kati kai khat vidarat॥(bharatendu)

adbhut ras vismay/ashchary

akhil bhuvan char- achar sab, hari mukh men lakhi matu. 
chakit bhee gadgadh vachan, vikasit drig pulakatu॥(senapati)

shant ras shamirved (vairagy\vitarag)

man re tan kagad ka putala. 
lagai boond binasi jay chhin men, garab karai kya itana॥ (kabir)

vatsaly ras vatsaly

kilakat kanh ghutaruvan avat. 
manimay kanak nnd ke angan bimb pakarive ghavat॥(sooradas)

bhakti ras bhagavadh vishayak rati\anurag

ram japu, ram japu, ram japu bavare. 
ghor bhav nir- nidhi, nam nij nav re॥

  • -3
ras ke udahran
  • -6
thats nothing of use .. :(
  • -7
Bhayanak ras jisme dar lagne ka anubhav ho
Use bhanayak ras khta h
  • -5
veer ras?
  • -1
plz give some simple ones
 
  • -6
which are easy to byheart
  • -1
(श्रंगार रस)
मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई
जाके सिर मोर मुकुट मेरा पति सोई (हास्य रस) सीरा पर गंगा हसै, भुजानि में भुजंगा हसै
हास ही को दंगा भयो, नंगा के विवाह में (वीर रस) माता ऐसा बेटा जानिये
कै शूरा कै भक्त कहाय (करुण रस) दुःख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूँ, आज जो नहीं कहीं  (शांत रस) जब मै था तब हरि नाहिं अब हरि है मै नाहिं
सब अँधियारा मिट गया जब दीपक देख्या माहिं (अदभुत रस) देखरावा मातहि निज अदभुत रूप अखण्ड
रोम रोम प्रति लगे कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड (भयानक रस) एक ओर अजगर हिं लखि, एक ओर मृगराय
विकल बटोही बीच ही, पद्यो मूर्च्छा खाय (रौद्र रस) उस काल मरे क्रोध के तन काँपने उसका लगा
मानो हवा के जोर से सोता हुआ सागर जगा
  • -2
Who wants easy answer?
  • -4
Thank uu
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  • -4
yes she is right.
  • -6
Spastikaran jaroor De please
  • -5
Which school do you read
  • -4
Here's a chart showing the details about ras

  • 22
What kind of problem mays be associated with our working environment
  • -3
शृंगार रस   रति/प्रेम शृंगार रस (संभोग शृंगार)

बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय।
सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)

वियोग शृंगार (विप्रलंभ शृंगार)

निसिदिन बरसत नयन हमारे,
सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे॥ (सूरदास)

हास्य रस हास

 तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप।
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता, धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)

करुण रस शोक

सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥
करहिं विलाप अनेक प्रकारा। परिहिं भूमि तल बारहिं बारा॥(तुलसीदास)

वीर रस उत्साह

वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।
सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो।
तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं॥ (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

रौद्र रस क्रोध

श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे।
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े॥ (मैथिलीशरण गुप्त)

भयानक रस भय

उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी।
चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों - सी॥ (जयशंकर प्रसाद)

वीभत्स रस जुगुप्सा/घृणा

सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत॥
गीध जांघि को खोदि-खोदि कै माँस उपारत।
स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥(भारतेन्दु)

अद्भुत रस विस्मय/आश्चर्य

अखिल भुवन चर- अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥(सेनापति)

शांत रस शम\निर्वेद (वैराग्य\वीतराग)

मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥ (कबीर)

वात्सल्य रस वात्सल्य

किलकत कान्ह घुटरुवन आवत।
मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत॥(सूरदास)

भक्ति रस भगवद् विषयक रति\अनुराग

राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे।
घोर भव नीर- निधि, नाम निज नाव रे॥

  • -2
शृंगार रस   रति/प्रेम शृंगार रस (संभोग शृंगार)

बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय।
सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)

वियोग शृंगार (विप्रलंभ शृंगार)

निसिदिन बरसत नयन हमारे,
सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे॥ (सूरदास)

हास्य रस हास

 तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप।
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता, धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)

करुण रस शोक

सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥
करहिं विलाप अनेक प्रकारा। परिहिं भूमि तल बारहिं बारा॥(तुलसीदास)

वीर रस उत्साह

वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।
सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो।
तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं॥ (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

रौद्र रस क्रोध

श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे।
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े॥ (मैथिलीशरण गुप्त)

भयानक रस भय

उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी।
चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों - सी॥ (जयशंकर प्रसाद)

वीभत्स रस जुगुप्सा/घृणा

सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत॥
गीध जांघि को खोदि-खोदि कै माँस उपारत।
स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥(भारतेन्दु)

अद्भुत रस विस्मय/आश्चर्य

अखिल भुवन चर- अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥(सेनापति)

शांत रस शम\निर्वेद (वैराग्य\वीतराग)

मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥ (कबीर)

वात्सल्य रस वात्सल्य

किलकत कान्ह घुटरुवन आवत।
मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत॥(सूरदास)

भक्ति रस भगवद् विषयक रति\अनुराग

राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे।
घोर भव नीर- निधि, नाम निज नाव रे॥








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रस स्थायी भाव उदाहरण शृंगार रस रति/प्रेम शृंगार रस (संभोग शृंगार)
बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय। 
सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)
वियोग श्रृंगार (विप्रलंभ शृंगार)
निसिदिन बरसत नयन हमारे, 
सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे॥ (सूरदास) हास्य रस हास  तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप। 
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता, धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी) करुण रस शोक सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥ 
करहिं विलाप अनेक प्रकारा। परिहिं भूमि तल बारहिं बारा॥(तुलसीदास) वीर रस उत्साह वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो। 
सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो। 
तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं॥ (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी) रौद्र रस क्रोध श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। 
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥ 
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े। 
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चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों - सी॥ (जयशंकर प्रसाद) वीभत्स रस जुगुप्सा/घृणा सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत। 
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत॥ 
गीध जांघि को खोदि-खोदि कै माँस उपारत। 
स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥(भारतेन्दु) अद्भुत रस विस्मय/आश्चर्य अखिल भुवन चर- अचर सब, हरि मुख में लखि मातु। 
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥(सेनापति) शांत रस शम\निर्वेद (वैराग्य\वीतराग) मन रे तन कागद का पुतला। 
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥ (कबीर) वात्सल्य रस वात्सल्य किलकत कान्ह घुटरुवन आवत। 
मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत॥(सूरदास) भक्ति रस भगवद् विषयक रति\अनुराग राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे। 
घोर भव नीर- निधि, नाम निज नाव रे॥

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1.श्रृंगार रस-   1.संयोग श्रृंगार     2.वियोग श्रृंगार संयोग श्रृंगार: उदाहरण- एक पल मेरे प्रिय के दृग पलक, थे उठे ऊपर सहज निचे गिर       चपलता ने इसे विकंपित पुलक से दृढ किया मनो प्रणय सम्बन्ध था!   वियोग श्रृंगार: उदाहरण- पीर मेरी कर रही गमगीन मुझको और उससे भी अधिक तेरे नयन का नीर, रानी और उससे भी अधिक हर पाँव की जंजीर, रानी!     2.वीर रस-             ‘‘हे सारथे ! हैं द्रोण क्या, देवेन्द्र भी आकर अड़े,
                  है खेल क्षत्रिय बालकों का व्यूह-भेदन कर लड़े।     3.शांत रस-    ऐसेहू साहब की सेवा सों होत चोरू रे।
            अपनी न बूझ, न कहै को राँडरोरू रे।।
            मुनि-मन-अगम, सुगत माइ-बापु सों।
            कृपासिंधु, सहज सखा, सनेही आपु सों।।    4.करुण रस-     हा सही ना जाती मुझसे अब आज भूख की जवाला ! कल से ही प्याश लगी है हो रहा ह्रदय मतवाला! सुनती हु तू राजा है मै प्यारी बेटी तेरी! क्या दया ना आती तुझको यह दशा देख कर मेरी!   5.रौद्र रस-     श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन छोभ से जलने लगे!                                          सब शील अपना भूलकर करतल युगल मलने लगे!                                          संसार देखे अब हमारे शत्रु रन में मृत पड़े!                                                करते हुए यह घोषणा हो गए उठकर खड़े!!   6.भयानक रस-     एक ओर अजग्रही लखी, एक ओर मृगराय!                                                विकल बटोही बिच ही, परयो मूर्छा खाय!!   7.वीभत्स रस-     सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खाक निकारत!                                              खींचत जिभाही स्यार अतिहि आनंद उर धारत!!                                            गीध जांघि को खोदी-खोदी के मांश उपारत!                                              स्वान अंगुरिन काटी-काटी के खात विदारत!!    
  • 9
9 rass
 
  • -2
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श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है। रस से जिस भाव की अनुभूति होती है वह रस का स्थायी भाव होता है। रस, छंद और अलंकार - काव्य रचना के आवश्यक अवयव हैं।

रस का शाब्दिक अर्थ है - निचोड़। काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है। यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। आदमी इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट जाता है। परंतु उन विषयों के प्रति लगाव नहीं छूटता। रस का प्रयोग सार तत्त्व के अर्थ में चरक, सुश्रुत में मिलता है। दूसरे अर्थ में, अवयव तत्त्व के रूप में मिलता है। सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय पर जो भाव रूप तथा वस्तु रूप में बचा रहे, वही रस है। रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है, वह भाव ही है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस अपूर्व की उत्पत्ति है। नाट्य की प्रस्तुति में सब कुछ पहले से दिया रहता है, ज्ञात रहता है, सुना हुआ या देखा हुआ होता है। इसके बावजूद कुछ नया अनुभव मिलता है। वह अनुभव दूसरे अनुभवों को पीछे छोड़ देता है। अकेले एक शिखर पर पहुँचा देता है। रस का यह अपूर्व रूप अप्रमेय और अनिर्वचनीय है।[1]

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a speaking activity on my eldorado
 
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I also need it
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भाव होता है। रस, छंद और अलंकार - काव्य रचना के आवश्यक अवयव हैं।

रस का शाब्दिक अर्थ है - निचोड़। काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है। यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। आदमी इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट जाता है। परंतु उन विषयों के प्रति लगाव नहीं छूटता। रस का प्रयोग सार तत्त्व के अर्थ में चरक, सुश्रुत में मिलता है। दूसरे अर्थ में, अवयव तत्त्व के रूप में मिलता है। सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय पर जो भाव रूप तथा वस्तु रूप में बचा रहे, वही रस है। रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है, वह भाव ही है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस अपूर्व की उत्पत्ति है। नाट्य की प्रस्तुति में सब कुछ पहले से दिया रहता है, ज्ञात रहता है, सुना हुआ या देखा हुआ होता है। इसके बावजूद कुछ नया अनुभव मिलता है। वह अनुभव दूसरे अनुभवों को पीछे छोड़ देता है। अकेले एक शिखर पर पहुँचा देता है। रस का यह अपूर्व रूप अप्रमेय और अनिर्वचनीय है।[

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भाव होता है। रस, छंद और अलंकार - काव्य रचना के आवश्यक अवयव हैं।

रस का शाब्दिक अर्थ है - निचोड़। काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है। यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। आदमी इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट जाता है। परंतु उन विषयों के प्रति लगाव नहीं छूटता। रस का प्रयोग सार तत्त्व के अर्थ में चरक, सुश्रुत में मिलता है। दूसरे अर्थ में, अवयव तत्त्व के रूप में मिलता है। सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय पर जो भाव रूप तथा वस्तु रूप में बचा रहे, वही रस है। रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है, वह भाव ही है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस अपूर्व की उत्पत्ति है। नाट्य की प्रस्तुति में सब कुछ पहले से दिया रहता है, ज्ञात रहता है, सुना हुआ या देखा हुआ होता है। इसके बावजूद कुछ नया अनुभव मिलता है। वह अनुभव दूसरे अनुभवों को पीछे छोड़ देता है। अकेले एक शिखर पर पहुँचा देता है। रस का यह अपूर्व रूप अप्रमेय और अनिर्वचनीय है।[

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Kisi kavita ya kisi path ko parthe samay hame jis anand ki anubhuti hoti h use ras kahte h..
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शांत रस शम\निर्वेद (वैराग्य\वीतराग)

मन रे तन कागद का पुतला। 
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥ (कबीर)

भक्ति रस-राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे। 
घोर भव नीर- निधि, नाम निज नाव रे॥
​​ र रस रति/प्रेम श्रृंगार रस (संभोग श्रृंगार)

बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय। 
सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)

वियोग श्रृंगार (विप्रलंभ श्रृंगार)

निसिदिन बरसत नयन हमारे, 
सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे॥ (सूरदास)

हास्य रस हास

 तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप। 
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता, धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)

करुण रस शोक

सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥ 
करहिं विलाप अनेक प्रकारा। परिहिं भूमि तल बारहिं बारा॥(तुलसीदास)

वीर रस उत्साह

वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो। 
सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो। 
तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं॥ (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

रौद्र रस क्रोध

श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। 
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥ 
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े। 
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े॥ (मैथिलीशरण गुप्त)

भयानक रस भय

उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी। 
चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों - सी॥ (जयशंकर प्रसाद)

वीभत्स रस जुगुप्सा/घृणा

सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत। 
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत॥ 
गीध जांघि को खोदि-खोदि कै माँस उपारत। 
स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥(भारतेन्दु)

अद्भुत रस विस्मय/आश्चर्य

अखिल भुवन चर- अचर सब, हरि मुख में लखि मातु। 
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥(सेनापति)

वात्सल्य रस वात्सल्य

किलकत कान्ह घुटरुवन आवत। 
मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत॥(सूरदास)

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vatsalya ras
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karun ras shingar ras bhanak ras
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same answer which is given by Amazing  Deepti.
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i knew it
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i knew it nn
 
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gulabjamun ka ras aamras
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a wire of resistance 20 ohm is ben to form a complete circle. The resistance between two points tapped at one fourth of circumference is
 
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Karun ras ka example ,rani vidhwa ho gayi hai vidhi ko bhi daya nahi aayi
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Hello
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Sanyog
Viyog
Hasya
Karun
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ee
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type in hindi if possible
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sorry . i does not have the subject hindi
 
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ras
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what is ras i dont know
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right
I'm happy
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uo
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nice answer by all
i like it ;)
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ya
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 what is the least number of four digits when increased by 7 divisible by 35,48 and56?
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"http://sarkarianswer.com/
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http://sarkarianswer.com/
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the amount of charge passing through a cell in 4s in 12C.what is the current supplied by the cell?
 
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apke naam ke age bhi to ras ata h
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‘अहोंकार मिुष्य का नििाश करता है।’- इस कथि कन स्पष्ट करिे के निए बड़े भाई साहब िे क्या-क्या उदाहरण नदए?
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Q14. An electric geyser consumes 2.2units of electrical energy per
hour of its use. It is designed to work on the mains voltage of 220V.
a) what is the power rating of this device?
b) What is the current flowing through this device when it is
connected across the mains?
c) What is the resistance of this device?
d) Does the resistance of this device remains constant during its
working?
e) What is the cost of energy consumed if each unit cost rupees
6?
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श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है। रस से जिस भाव की अनुभूति होती है वह रस का स्थायी भाव होता है। रसछंद और अलंकार - काव्य रचना के आवश्यक अवयव हैं।

रस का शाब्दिक अर्थ है - निचोड़। काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है। यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। आदमी इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट जाता है। परंतु उन विषयों के प्रति लगाव नहीं छूटता। रस का प्रयोग सार तत्त्व के अर्थ में चरक, सुश्रुत में मिलता है। दूसरे अर्थ में, अवयव तत्त्व के रूप में मिलता है। सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय पर जो भाव रूप तथा वस्तु रूप में बचा रहे, वही रस है। रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है, वह भाव ही है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस अपूर्व की उत्पत्ति है। नाट्य की प्रस्तुति में सब कुछ पहले से दिया रहता है, ज्ञात रहता है, सुना हुआ या देखा हुआ होता है। इसके बावजूद कुछ नया अनुभव मिलता है। वह अनुभव दूसरे अनुभवों को पीछे छोड़ देता है। 

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श्रव्य काव्य के पठन अथवा श्रवण एवं दृश्य काव्य के दर्शन तथा श्रवण में जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है, वही काव्य में रस कहलाता है। रस से जिस भाव की अनुभूति होती है वह रस का स्थायी भाव होता है। रसछंद और अलंकार - काव्य रचना के आवश्यक अवयव हैं।

रस का शाब्दिक अर्थ है - निचोड़। काव्य में जो आनन्द आता है वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस लौकिक न होकर अलौकिक होता है। रस काव्य की आत्मा है। संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।

रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, स्वप्न की स्मृति रहती है। रस आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का, विराट का अनुभव भी है। यही आनंद अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। आदमी इन्द्रियों पर संयम करता है, तो विषयों से अपने आप हट जाता है। परंतु उन विषयों के प्रति लगाव नहीं छूटता। रस का प्रयोग सार तत्त्व के अर्थ में चरक, सुश्रुत में मिलता है। दूसरे अर्थ में, अवयव तत्त्व के रूप में मिलता है। सब कुछ नष्ट हो जाय, व्यर्थ हो जाय पर जो भाव रूप तथा वस्तु रूप में बचा रहे, वही रस है। रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है, वह भाव ही है। जब रस बन जाता है, तो भाव नहीं रहता। केवल रस रहता है। उसकी भावता अपना रूपांतर कर लेती है। रस अपूर्व की उत्पत्ति है। नाट्य की प्रस्तुति में सब कुछ पहले से दिया रहता है, ज्ञात रहता है, सुना हुआ या देखा हुआ होता है। इसके बावजूद कुछ नया अनुभव मिलता है। वह अनुभव दूसरे अनुभवों को पीछे छोड़ देता है। 

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I DONT KNOW HINDI
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why does copper turn green when exposed in air/
 
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I DONT KNOW HINDI
 
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good questions 
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root 6 +root 6+root6+root6......infinete
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WRITTEN IN BOOK
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GULAB JAMUN KA RAS
 
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What is hasya ras
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1. Shringar ras,         2. Haasya ras,      3.Karun ras,
4. Roudra ras,          5.Vir ras,                6. Bhayanak ras,
7. Vibhats ras,          8. Adhbudh ras      9. Shant ras



 
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1. Rati,       2. Haas,          3. Shok,     
4. Krodh,    5.Utsah,          6. bhy,
7. Ghrina,   8.Ashcharya,  9. Bhaid
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do it yourself or you will never learn
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Jis kavyansh ya kahani ko pad ker hame anand milta hai use ras kahate hai
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Jis kavyansh ko pad ker hame anand milta hai use ras kahate hai
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i dont know hindi
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mera there kya hoga
  • 0
Don't know
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Raudra ras ka example

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written in book..
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rass aur uski ankh
 
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orange ras
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ohk
oh thi is ras
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SAME AS NIKHIL;
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ras- kisi chapter ya poem ko padhne ke baad jo feelings hum mehsoos karte hain ya jo bhav hame milte hain use ras kehte hain.

ras ke nimn-likhit das bhed hain.
1.shrangar ras-isme nayak-nayika soundrya prem darshaya jata hai.iske do bhed hain-sanyog aur viyog?
eg. dekhu tat basant suhava
? ? priya heen mori ur upjava

2.vir ras- utshah, virta ka bhav.
eg.manav samaj mein arun pada
? ?jal jantu beach ho varun pada
? is tarah bha-bhakta rana tha
mano sarpo (snakes) mein garun pada

3.vibhats ras- jugupsa namak sthayi bhav, ghrana ka bhav.
eg.ankhen nikal ud jate, chan bhar ud kar aa jate
? ? shav jheebh kheench kar kove (crows), chubhla-chubhla kar khate.

4.hasya ras- has sthayi bhav, hasi ka bhav.
eg.ek chatur nath badi hosiyar, karke shrangar vo bar-bar

5.rodra ras- krodh ki teevrata
eg.ati ras bole vachan kathor
? ? ?begi dekhao moodh na aaju
? ? ?ultaun mahi jahn lag tavraju

6.karun ras- shok ka bhav, priy ka viyog, mrityu.
eg.haye ram kase jhele ham apni lajja apna shok
? ? ?gaya hamare hi hathon se apna rashtrapita parlok.

7.adbhut ras- aascharya janak varnan, vishmay ki avstha.
eg.dekh yashoda shishu ke mukh mein, sakal vishva ki maya
? ?chan bhar ko veh bani achetan, hil na saki komal kaya.

8.bhyanak ras- bhay ki sthithi, bhyanak drashya
eg.baldhi bisal, vikral, jwal-jal mano
? ? ?lank lilibe ko kal rasna pasari hai.

9.shant ras- parmatma ka dhyan, pooja, varagya, stuti ka bhav
eg.mere to prabhu gir-dhar nagar, doosra na koyi

10.vatsalya ras- mamta ka bhav
eg. maiya mori main nahi makhan khayo

hope,it helps.
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uuhju
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Is It for CBSE hindi syllabus??
 
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RAS TYPES ARE

Image result for RAS AND ITS TYPES in hindi WITH EXAMPLES
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May be help u

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Very Easy...
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 this is ras 
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Here are the diff types of ras

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Definition of ras

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रस स्थायी भाव उदाहरण चित्र शृंगार रस रति/प्रेम शृंगार रस (संभोग शृंगार) बतरस लालच लाल की, मुरली धरि लुकाय। सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी) वियोग शृंगार (विप्रलंभ शृंगार) निसिदिन बरसत नयन हमारे, सदा रहति पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे॥ (सूरदास) हास्य रस हास तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप, साज मिले पंद्रह मिनट घंटा भर आलाप। घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता, धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी) करुण रस शोक सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी॥ करहिं विलाप अनेक प्रकारा। परिहिं भूमि तल बारहिं बारा॥(तुलसीदास) वीर रस उत्साह वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो। सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो। तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं॥ (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी) रौद्र रस क्रोध श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे। सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे॥ संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े। करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े॥ (मैथिलीशरण गुप्त) भयानक रस भय उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी। चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों - सी॥ (जयशंकर प्रसाद) वीभत्स रस जुगुप्सा/घृणा सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत। खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत॥ गीध जांघि को खोदि-खोदि कै माँस उपारत। स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत॥(भारतेन्दु) अद्भुत रस विस्मय/आश्चर्य अखिल भुवन चर- अचर सब, हरि मुख में लखि मातु। चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु॥(सेनापति) शांत रस शम\निर्वेद (वैराग्य\वीतराग) मन रे तन कागद का पुतला। लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना॥ (कबीर) वात्सल्य रस वात्सल्य किलकत कान्ह घुटरुवन आवत। मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत॥(सूरदास) भक्ति रस भगवद् विषयक रति\अनुराग राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे। घोर भव नीर- निधि, नाम निज नाव रे॥
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11 types of ras is vatsalya ras
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ras is a type of lesson in hindi \
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hiiiiiiiiiiiiiiii
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ras wo hote he jab koi kavaya ki panthi ko padhne baad jo utsa hoti he voo ras hote he
1.rati
2.hasya 
3.soka
4.krodha
5. utsaha
6.bhaya
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google kao yaar
 
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WHAT IS STIOCHIOMETRY
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BETWEEN STRUCTURAL AND MOLECULAR FORMULA FOR ORGANIC COMPOUNDS
 
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5 Easiest example of adbhut ras
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xczvbxcghc
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qwert gvfeiod . fefdkmckdi43 ccveklmkl d . fcdiowanvk vmfioemal  fmdeokdl fmdiowklas bfioecksv fdev oificdksm  edxefh vrfcks . frdesgv     jrieja fpodepijpg
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