swatantrata sangram mein nariyon ki bhoomika

स्वतंत्रता की लड़ाई में स्त्री समाज ने पुरुषों के बराबर की भूमिका निभाई थी। यह आजादी मात्र पुरुष समाज के लिए नहीं अपितु स्त्री समाज के लिए भी आवश्यक थी। स्त्रियों ने स्वयं को भी इस संग्राम से जोड़ लिया था। वह भी अपने देश के प्रति अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करते हुए पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हो गईं। इस संग्राम में सबने अपना पुरा सहयोग दिया था। स्त्रियों ने घुंघट छोड़कर कमर कस ली थी और आज़ादी पाने को अपना लक्ष्य बना लिया। झांसी की रानी, रानी चेनम्मा, सरोजनी नायडू, कस्तूरबा गांधी, महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान, विजयालक्ष्मी पंडित, मैडम भीकाजी कामा, पदमजा नायडू, सुचेता कुपलानी और सिस्टर निवेदिता इत्यादि स्त्रियों ने इस संग्राम में अंग्रेज़ों के छक्के छुड़ा दिए थे। इसके अतिरिक्त ऐसे बहुत से नाम है जिन्हें हम जानते नहीं है। परन्तु उनकी भूमिका को भूलाया नहीं जा सकता है।जो इस गलतफहमी को बाँधे हुए था कि स्त्रियाँ घर की शोभा होती है, स्त्रियों ने अपने कार्यों से उन्हें चमत्कृत कर दिया था । पुलिस द्वारा पुरुष दल को गिरा दिए जाने पर स्त्रियों ने आंदोलन का नेतृत्व कर इन्हें सफल बनाया था। इन्होंने पुरुषों के समान ही इस संग्राम में पुलिस के डंडे ही नहीं खाए अपितु जेलों में उनके समान ही अत्याचार भी सहे हैं। इनके दृढ़ सहयोग के कारण ही पुरुष भी निर्भिक होकर मैदानों में उतर पड़े। अंग्रेज़ी सरकार को इन्होंने नाको चने चबावा दिए थे। इनके योगदान को हम नमन करते हैं।

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