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अनुच्छेद संग्रह

अनुच्छेद लेखन - परिचय

अनुच्छेद-लेखन

किसी  भी एक वाक्य, सूक्ति या काव्य-पंक्ति के विषय में कुछ पंक्तियाँ लिखना 'अनुच्छेद-लेखन' कहलाता है। एक अनुच्छेद में एक विचार या भाव का ही विस्तार किया जाता है। यह निबंध का ही छोटा स्वरूप है। निबंध के अंदर विषय पर विस्तार से लिखा जाता है। इसे दोहे, पदों, उदाहरणों इत्यादि के द्वारा स्पष्ट किया जाता है। इन्हीं सबको अनुच्छेद में बहुत ही संक्षेप रूप में लिखा जाता है।


अनुच्छेद लिखते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

1. अनुच्छेद सीमित शब्दों में लिखा जाता है।

2. यह मूल विषय पर हीं केन्द्रित रहते हैं, अपने आप में पूर्ण रहते हैं।

3. इनमें भूमिका और निष्कर्ष देने की आवश्यकता नहीं होती है।

4. इनमें अनावश्यक प्रसंग नहीं होने चाहिए।

5. अनुच्छेदों के बीच तारतभ्य तथा क्रमबद्धता होनी चाहिए।

6. विषय का फैलाव नहीं होना चाहिए।

7. रोचकता और मन-रमाने की शक्ति होनी चाहिए।

8. विषय को 10-12 वाक्यों या 80-100 शब्दों में बाँधना चाहिए।

9. वाक्य छोटे व आपस में जुड़े होने चाहिए।

10. उदाहरणों के केवल संकेत मात्र दिए जाने चाहिए, इनका विस्तार नहीं होना चाहिए।

आप जहाँ भी चले जाएँ भ्रष्टाचार की जड़ें गहराई तक अपनी पकड़ बना चुकी हैं, इसका नुकसान यह हुआ है कि देश का विकास रूक रहा है। लोग भोग, विलास और भौतिक सुख-सुविधाओं के नाम पर धन एकत्र करने में जुटे पड़े हैं। धन की लिप्सा उन्हें हर अनैतिक कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है और वे करते चले जाते हैं। कुछ भ्रष्ट व्यवहार करने वाले व्यक्तियों के कारण भ्रष्टाचार की बीमारी हर क्षेत्र में विद्यमान हो चुकी है। पहले यह बीमारी सरकारी और गैर सरकारी विभागों, विद्यालयों, कालेजों और बैंकों तक ही तक ही सीमित थी परन्तु आज धर्म भी भ्रष्टाचार की बीमारी से स्वयं को बचा नहीं पाया है। इस प्रकार के भ्रष्टाचार को आध्यात्मिक भ्रष्टाचार के नाम से जाना जाता है। आध्यात्मिक भ्रष्टाचार समाज में दिनों-दिनों बढ़ रहा है। भगवान के नाम पर धर्मगुरूओं द्वारा आम जनता की भावनाओं से खेला जा रहा है। वर्तमान युग में मनुष्य दूसरों को पीछे छोड़ने की दौड़ में भाग रहा है। इस भागदौड़ वाले जीवन ने उसे चिड़चिड़ा और अशांत बना दिया है, इस कारण उसके मन में शांति नहीं है। वह शांति की तलाश में भटकता रहता है। धर्मगुरूओं के पास उसे आशा की किरण नज़र आती है। यदि कुछ धर्मगुरूओं को छोड़ दिया जाए, तो अधिकतर धर्मगुरूओं का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। वे जनता को केवल उनके धन के लिए प्रयोग कर रहे हैं। हर दूसरा व्यक्ति धर्मगुरू बन जाता है। जनता इनको अपना सर्वस्व अर्पण कर देती है। परन्तु जब समाज के आगे इनका झूठ खुलता है, तो जनता स्वयं को ठगा-सा महसूस करती है। गुरू ईश्वर प्राप्ति का मार्ग होता है परन्तु जब गुरू ही भटका हुआ हो, तो जनता को धोखे और भटकाव के अतिरिक्त कुछ प्राप्त नहीं हो सकता है। समाज में व्याप्त इस प्रकार के भ्रष्टाचार को आध्यात्मिक भ्रष्टाचार कहा जाता है, जो लोगों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करता हुआ तेज़ी से बढ़ रहा है। 

अनुशासन मनुष्य के विकास के लिए बहुत आवश्यक है। यदि एक समाज और देश में लोग अनुशासन में चलते हुए जीवनयापन करेंगे और अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह पूरी निष्ठा से करेंगे, तो देश के और अपने विकास को सफलता के शिखर में पहुँचा सकते हैं। मनुष्य द्वारा नियमों में रहकर नियमित रूप से अपने कार्य को करना अनुशासन कहलाता है। यदि किसी के अंदर अनुशासनहीनता होती है, तो वह स्वयं के लिए कठिनाईयों की खाई खोद डालता है। उसका जीवन सदा अस्त-व्यस्त रहता है।यदि मनुष्य अनुशासन से जीवनयापन करता है, तो वह स्वयं के लिए सुखद और उज्जवल भविष्य की राह निर्धारित करता है। विद्यार्थी हमारे देश का मुख्य आधार स्तंभ हैं।यदि इनमें अनुशासन की कमी होगी, तो हम सोच सकते हैं कि देश का भविष्य कैसा होगा। विद्यार्थी जीवन में अनुशासन का बहुत महत्व होता है।...

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