NCERT Solutions for Class 12 Humanities Hindi Chapter 1 जयशंकर प्रसाद are provided here with simple step-by-step explanations. These solutions for जयशंकर प्रसाद are extremely popular among Class 12 Humanities students for Hindi जयशंकर प्रसाद Solutions come handy for quickly completing your homework and preparing for exams. All questions and answers from the NCERT Book of Class 12 Humanities Hindi Chapter 1 are provided here for you for free. You will also love the ad-free experience on Meritnation’s NCERT Solutions. All NCERT Solutions for class Class 12 Humanities Hindi are prepared by experts and are 100% accurate.

Page No 18:

Question 1:

'दीप अकेला' के प्रतीकार्थ को स्पष्ट करते हुए बताइए कि उसे कवि ने स्नेह भरा, गर्व भरा एवं मदमाता क्यों कहा है?

Answer:

इस कविता में दीप को अकेला बताया गया है। हर मनुष्य भी संसार में अकेला आता है। पंक्ति का अर्थ समाज से लिया गया है। पंक्ति में दीप को लाकर रख देना का तात्पर्य है कि उसे समाज का एक भाग बना देना। कविता में दीप एक ऐसे व्यक्ति का प्रतीक है, जो स्नेह, गर्व तथा अहंकार से युक्त है। दीप तेल के कारण जलता है, वैसे ही मनुष्य भी स्नेह के कारण जीवित रहता है। दीप संसार को प्रकाशित करता है। उसकी लौ झुकती नहीं है, जो उसके गर्व का सूचक है। मनुष्य में अपने कार्यों के कारण गर्व विद्यमान होता है, वह कहीं झुकता नहीं है। जलते हुए दीप की लौ इधर-उधर हिलती रहती है। कवि ने इसे ही मदमाती कहा है। मनुष्य भी मस्ती में इधर-उधर मदमाता रहता है। यही कारण है कि कवि ने उसे स्नेह भरा, गर्व भरा एव मदमाता कहा है।

Page No 18:

Question 2:

यह दीप अकेला है 'पर इसको भी पंक्ति को दे दो' के आधार पर व्यष्टि का समिष्ट में विलय क्यों और कैसे संभव है?

Answer:

प्रस्तुत कविता में दीप मनुष्य का प्रतीक स्वरूप है। इसमें विद्यमान पंक्ति शब्द समाज का प्रतीक स्वरूप है। दीप को पंक्ति में रखने का तात्पर्य समाज के साथ जोड़ना है। इसे ही व्यष्टि का समिष्ट में विलय कहा गया है। ऐसा होना आवश्यक है। समाज में रहकर ही मनुष्य अपना तथा समाज का कल्याण करता है। इस तरह ही समाज और मनुष्य का कल्याण होता है। जिस तरह दीप पंक्ति में स्थान पाकर अधिक बल से संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही मनुष्य समाज में एकीकार होकर समाज का विकास करता है। दोनों का विलय होना आवश्यक है। उनकी शक्ति का विस्तार है। अकेला व्यक्ति और दीप कुछ नहीं कर सकते हैं। जब वह पंक्ति तथा समाज में विलय होते हैं, तो उनकी शक्ति का विस्तार होता है। अन्य के साथ मिलकर वह अधिक शक्तिवान हो जाते हैं। 

Page No 18:

Question 3:

'गीत' और 'मोती' की सार्थकता किससे जुड़ी है?

Answer:

गीत तभी सार्थक है, जब वह गायन से जुड़ा हुआ है और मोती तभी सार्थक है, जब गोताखोर उसे बाहर निकाल लाए। गीत को जब तक गाया नहीं जाएगा, तब तक उसकी सार्थकता निरर्थक है। पन्ने में लिखा गीत अपनी पहचान नहीं बना सकता है। जब लोगों द्वारा गाया जाएगा, तभी उसे पहचाना जाएगा। तभी वह सार्थक कहलाएगा।
ऐसे ही मोती को यदि कोई गोताखोर समुद्र की गहराई से निकालकर बाहर नहीं लाएगा, उसे कोई नहीं पहचान पाएगा। समुद्र की गोद में कितने ही मोती विद्यमान होंगे। वह बाहर नहीं लाए गए हैं। अतः उन्हें कोई नहीं पहचानता है। वे समुद्र तल में निरर्थक ही हैं।

Page No 18:

Question 4:

'यह अद्वितीय-यह मेरा-यह मैं स्वयं विसर्जित'- पंक्ति के आधार पर व्यष्टि के समष्टि में विसर्जन की उपयोगिता बताइए।

Answer:

जब व्यष्टि का समष्टि में विसर्जन होता है, तब उसकी उपयोगिता बढ़ जाती है। प्रत्येक व्यक्ति सभी गुणों से युक्त है लेकिन समाज में उसका विलय नहीं है, तो वह अकेला होगा। अकेला वह अपने गुणों का लाभ न स्वयं उठा पाएगा और न किसी अन्य का भला कर पाएगा। जब वह समाज के साथ जुड़ जाता है, तब उसके गुणों का सही लाभ उठाया जा सकता है। अपने गुणों से वह समाज का कल्याण करता है। इस तरह वह अपने साथ-साथ समाज का भी सही मार्गदर्शन करता है। समाज का विकास होता है और समाज में एकता स्थापित होती है। तभी कवि ने कहा है कि दीप का पंक्ति में विलय होना अर्थात एक व्यक्ति का समाज में विलय होना है। समाज में विलय होने से वह स्वयं के व्यक्तित्व को विशालता प्रदान करता है। वह अकेले बहुत कुछ कर सकने की हिम्मत रखता है। जब वह स्वयं को समाज में मिला लेता है, तो वह समाज को मज़बूत कर देता है। इससे हमारे राष्ट्र को मज़बूती मिलती है।

Page No 18:

Question 5:

'यह मधु है ............ तकता निर्भय'- पंक्तियों के आधार पर बताइए कि 'मधु', 'गोरस' और 'अंकुर' की क्या विशेषता है?

Answer:

कवि के अनुसार 'मधु' अर्थात शहद की विशेषता होती है कि इसे बनने में एक लंबा समय लगता है। समय इसे स्वयं धीरे-धीरे टोकरे में एकत्र करता है। उसके बाद जाकर हमें यह मिलता है।

'गोरस' हमें जीवन के रूप में विद्यमान कामधेनु गाय से प्राप्त होता है। यह अमृत के समान दूध है। इसका पान देवों के पुत्र करते हैं।

'अंकुर' की अपनी विशेषता है। यह पृथ्वी की कठोर धरती को भी अपने कोमल पत्तों से भेदकर बाहर निकल जाता है। सूर्य को देखने से यह डरता नहीं है। निडरता से उसका सामना करता है।  



Page No 19:

Question 6:

भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-

(क) 'यह प्रकृत, स्वयंभू ............. शक्ति को दे दो।'

(ख) 'यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक .............. चिर-अखंड अपनापा।'

(ग) 'जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो।'

Answer:

(क)  कविता में प्रकृत, स्वयंभू और ब्रह्मा संज्ञाएँ अंकुर (बीज) को दी गई हैं। अंकुर धरती से बाहर आने के लिए स्वयं ही प्रयास करता है। वह धरती का सीना चीरकर स्वयं बाहर आ जाता है। सूर्य की ओर देखने से वह डरता नहीं है। निडरता से उसे देखता है। इस तरह कवि के अनुसार कवि भी गीतों का निर्माण स्वयं करता है। उनका गान निर्भयता से करता है। कवि चाहता है कि उसे में अन्य के समान सम्मान दिया जाना चाहिए।
 
(ख) दीप सदैव आग को धारण किए रहता है। इस कारण से वह उसके दुख को बहुत अच्छी तरह से जानता है। इस सबके बाद भी वह दयाभाव से युक्त होकर स्वयं जलता है और दूसरों को प्रकाश देता है। वह सदा जागरूक रहता है, सावधान है और सबके साथ प्रेम का भाव रखता है।
 
(ग) कविता में दीप को कवि ने व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है। व्यक्ति हमेशा जिज्ञासु प्रवृत्ति का रहा है। इसी कारण वह ज्ञानवान और श्रद्धा से भरा हुआ है। मनुष्य तथा दीप दोनों में ये गुण विद्यमान होते हैं।  

Page No 19:

Question 7:

'यह दीप अकेला' एक प्रयोगवादी कविता है। इस कविता के आधार पर 'लघु मानव' के अस्तित्व और महत्व पर प्रकाश डालिए।

Answer:

प्रस्तुत कविता में कवि ने दीपक की विशेषता बताई है। वह अकेला जलता है। इसके बाद भी वह स्नेह से युक्त है, उसमें गर्व विद्यमान है। उसका व्यक्तित्व इतना विशाल है कि अकेले में भी अपने को सार्थकता प्रदान कर रहा है। उसमें विद्यमान गुण समाज के लिए बहुत आवश्यक हैं। आवश्यकता पड़ने पर वह अपना सर्वस्व समाज के लिए दे सकता है। वह नहीं चाहता कि कोई आत्मत्याग के लिए उस पर दबाव डाले। वह इसे अपनी स्वेच्छा से करने के हक में है। 

Page No 19:

Question 8:

कविता के लाक्षणिक प्रयोगों का चयन कीजिए और उनमें निहित सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।

Answer:

कविता में कवि ने बहुत-से लाक्षणिक प्रयोगों का चयन किया है। सबसे पहले उसने 'यह दीप अकेला' में व्यक्ति के प्रतीक के रूप में दीप का प्रयोग किया है। दूसरे 'जीवन-कामधेनु' में उसने जीवन को कामधेनु गाय के समान दिखाया है। तीसरे 'पंक्ति' शब्द का प्रयोग उसने समाज के लिए किया है। अतः जब वह 'पंक्ति में जगह देना' की बात करता है, तो इसका तात्पर्य समाज का अंग बनाना है। इसी तरह 'नहीं तो अपनी लघुता में भी काँपा' में मनुष्य के छोटे होने की बात कही गई है। मनुष्य का विशेष गुण है कि वह फिर भी स्वयं के अस्तित्व को बनाए रखता है। काँपता नहीं है। वहीं 'एक बूंद' में भी मनुष्य के छोटे स्वरूप को चित्रित किया गया है। 'सूरज की आग' को ज्ञान का प्रकाश बताया गया है।

Page No 19:

Question 1:

'सागर' और 'बूँद' से कवि का क्या आशय है?

Answer:

'सागर' से कवि का आशय समाज से है तथा 'बूँद' का आशय एक मनुष्य से है। अनगिनत बूँदों के कारण सागर का निर्माण होता है। यहाँ सागर समाज है और बूँद एक मनुष्य है। मनुष्य इस समाज में रहकर अस्तित्व पाता है और समाज उसे अपनी देख-रेख में एक सभ्य मनुष्य बनाता है। दोनों का संबंध परस्पर संयोग से बनाता है। दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। कवि इनका संबंध सागर और बूँद के रूप में स्पष्ट करके उनकी संबंध की प्रगाढ़ता को दर्शाता है।

Page No 19:

Question 2:

'रंग गई क्षणभर, ढलते सूरज की आग से'- पंक्ति के आधार पर बूँद के क्षणभर रंगने की सार्थकता बताइए।

Answer:

पानी की बूँद समुद्र से ऊपर छँलाग मारती है। वह क्षणभर के लिए समुद्र से अलग हो जाती है, उस समय उस पर अस्त होते सूर्य की किरणें पड़ती हैं। उसके कारण वह सोने के समान रंग वाली हो जाती है। वह सोने के रंग में क्षणभर के लिए चमकती है मगर उस थोड़े समय में वह अपना महत्व दर्शा जाती है अर्थात अपनी सार्थकता बता जाती है। 

Page No 19:

Question 3:

'सूने विराट के सम्मुख...............दाग से!'- पंक्तियों का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।

Answer:

इस संसार में हर वस्तु नश्वर है। तात्पर्य है कि हर वस्तु को एक दिन समाप्त हो जाना है। इस के डर से मनुष्य भयभीत रहता है। मगर जब बूँद सागर से क्षणभर के लिए अलग होती है, तो उसे नष्ट होने का डर समाप्त हो जाता है। मुक्ति का अहसास उसके हृदय में भर जाता है। यह वह क्षण होता है, जब वह स्वयं के जीवन को या अस्तित्व को सार्थक कर देती है। मधुर मिलने से प्राप्त प्रकाश इस कलंक को धो डालता है कि मनुष्य जीवन भी एक दिन समाप्त हो जाएगा। प्रकाशित वह क्षण ही उसके जीवन को सार्थकता प्रदान कर देती है। कवि उस बूँद में उस विशालता के दर्शन के करता है, जो उसे सागर की अथाह जल राशि को देखकर भी प्राप्त नहीं होता है। उस अहसास होता है कि वह अपने समाप्त होने वाले शरीर से भी ऐसे कार्य कर सकता है, जो उसके छोटे से जीवन को सार्थकता प्रदान करता है। वह ऐसा साधक बन जाता है, जिसे सभी पापों से छुटकारा मिल गया है।

Page No 19:

Question 4:

'क्षण के महत्व' को उजागर करते हुए कविता का मूल भाव लिखिए।

Answer:

यह कविता मनुष्य को क्षण का महत्व बताती है। कवि चाहता है कि मनुष्य द्वारा स्वार्थहित से स्वयं को हटाकर व्यष्टि का समष्टि में विलय कर देना चाहिए। इस संसार में विद्यमान प्रत्येक व्यक्ति दुखी है। अतः हमें चाहिए कि मिलकर लोगों के दुखों को दूर करने का प्रयास करें। इसी तरह एक बूँद सागर से अलग होकर क्षण भर में सूर्य के प्रकाश से चमक उठती है। यह हमें सीख देता है कि इस विशाल संसार में मनुष्य अपने नश्वर शरीर के साथ भी स्वयं के छोटे-से जीवन को सार्थक कर सकता है। यह क्षण ही तो है, जो उसे स्वयं को सार्थक करने के लिए अवसर प्रदान करता है। इसी क्षण के कारण वह समुद्र रूपी संसार में बूँद के समान होते हुए भी सूर्य की चमक से स्वयं को चमका जाता है। उसकी क्षण भर की चमक लोगों को प्रेरित करती है। वह नश्वरता के कलंक से आज़ाद हो जाता है। क्षण उसके जीवन में विशेष महत्व रखता है।

Page No 19:

Question 1:

अज्ञेय की कविताएँ 'नदी के द्वीप' व 'हरी घास पर क्षणभर' पढ़िए और कक्षा की भित्ति पत्रिका पर लगाइए।

Answer:

1) नदी के द्वीप
 

हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के।
किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।
पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे।

और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते?
रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे।
अनुपयोगी ही बनाएँगे।

द्वीप हैं हम! यह नहीं है शाप। यह अपनी नियती है।
हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी की क्रोड में।
वह बृहत भूखंड से हम को मिलाती है।
और वह भूखंड अपना पितर है।
नदी तुम बहती चलो।
भूखंड से जो दाय हमको मिला है, मिलता रहा है,
माँजती, सस्कार देती चलो। यदि ऐसा कभी हो -

तुम्हारे आह्लाद से या दूसरों के,
किसी स्वैराचार से, अतिचार से,
तुम बढ़ो, प्लावन तुम्हारा घरघराता उठे -
यह स्रोतस्विनी ही कर्मनाशा कीर्तिनाशा घोर काल,
प्रावाहिनी बन जाए -
तो हमें स्वीकार है वह भी। उसी में रेत होकर।
फिर छनेंगे हम। जमेंगे हम। कहीं फिर पैर टेकेंगे।
कहीं फिर भी खड़ा होगा नए व्यक्तित्व का आकार।
मात, उसे फिर संस्कार तुम देना।

2) हरी घास पर क्षणभर
आओ बैठें
इसी ढाल की हरी घास पर।

माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है,
और घास तो अधुनातन मानव-मन की भावना की तरह
सदा बिछी है-हरी, न्यौती, कोई आ कर रौंदे।

आओ, बैठो
तनिक और सट कर, कि हमारे बीच स्नेह-भर का व्यवधान रहे, बस,
नहीं दरारें सभ्य शिष्ट जीवन की।

चाहे बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो, स्वगत गुनगुनाओ,
चाहे चुप रह जाओ-
हो प्रकृतस्थ : तनो मत कटी-छँटी उस बाड़ सरीखी,
नमो, खुल खिलो, सहज मिलो
अन्त:स्मित, अन्त:संयत हरी घास-सी।

क्षण-भर भुला सकें हम
नगरी की बेचैन बुदकती गड्ड-मड्ड अकुलाहट-
और न मानें उसे पलायन;
क्षण-भर देख सकें आकाश, धरा, दूर्वा, मेघाली,
पौधे, लता दोलती, फूल, झरे पत्ते, तितली-भुनगे,
फुनगी पर पूँछ उठा कर इतराती छोटी-सी चिड़िया-
और न सहसा चोर कह उठे मन में-
प्रकृतिवाद है स्खलन
क्योंकि युग जनवादी है।

क्षण-भर हम न रहें रह कर भी :
सुनें गूँज भीतर के सूने सन्नाटे में किसी दूर सागर की लोल लहर की
जिस की छाती की हम दोनों छोटी-सी सिहरन हैं-
जैसे सीपी सदा सुना करती है।

क्षण-भर लय हों-मैं भी, तुम भी,
और न सिमटें सोच कि हम ने
अपने से भी बड़ा किसी भी अपर को क्यों माना!

क्षण-भर अनायास हम याद करें :
तिरती नाव नदी में,
धूल-भरे पथ पर असाढ़ की भभक, झील में साथ तैरना,
हँसी अकारण खड़े महा वट की छाया में,
वदन घाम से लाल, स्वेद से जमी अलक-लट,
चीड़ों का वन, साथ-साथ दुलकी चलते दो घोड़े,
गीली हवा नदी की, फूले नथुने, भर्रायी सीटी स्टीमर की,
खँडहर, ग्रथित अँगुलियाँ, बाँसे का मधु,
डाकिये के पैरों की चाप,
अधजानी बबूल की धूल मिली-सी गन्ध,
झरा रेशम शिरीष का, कविता के पद,
मसजिद के गुम्बद के पीछे सूर्य डूबता धीरे-धीरे,
झरने के चमकीले पत्थर, मोर-मोरनी, घुँघरू,
सन्थाली झूमुर का लम्बा कसक-भरा आलाप,
रेल का आह की तरह धीरे-धीरे खिंचना, लहरें
आँधी-पानी,
नदी किनारे की रेती पर बित्ते-भर की छाँह झाड़ की
अंगुल-अंगुल नाप-नाप कर तोड़े तिनकों का समूह, लू, मौन।

याद कर सकें अनायास : और न मानें
हम अतीत के शरणार्थी हैं;
स्मरण हमारा-जीवन के अनुभव का प्रत्यवलोकन-
हमें न हीन बनावे प्रत्यभिमुख होने के पाप-बोध से।
आओ बैठो : क्षण-भर :
यह क्षण हमें मिला है नहीं नगर-सेठों की फैया जी से।
हमें मिला है यह अपने जीवन की निधि से ब्याज सरीखा।

आओ बैठो : क्षण-भर तुम्हें निहारूँ
अपनी जानी एक-एक रेखा पहचानूँ
चेहरे की, आँखों की-अन्तर्मन की
और-हमारी साझे की अनगिन स्मृतियों की :
तुम्हें निहारूँ,
झिझक न हो कि निरखना दबी वासना की विकृति है!

धीरे-धीरे
धुँधले में चेहरे की रेखाएँ मिट जाएँ-
केवल नेत्र जगें : उतनी ही धीरे
हरी घास की पत्ती-पत्ती भी मिट जावे लिपट झाड़ियों के पैरों में
और झाड़ियाँ भी घुल जावें क्षिति-रेखा के मसृण ध्वान्त में;
केवल बना रहे विस्तार-हमारा बोध
मुक्ति का,
सीमाहीन खुलेपन का ही।

चलो, उठें अब,
अब तक हम थे बन्धु सैर को आये-
(देखे हैं क्या कभी घास पर लोट-पोट होते सतभैये शोर मचाते?)
और रहे बैठे तो लोग कहेंगे
धुँधले में दुबके प्रेमी बैठे हैं।

-वह हम हों भी तो यह हरी घास ही जाने :
(जिस के खुले निमन्त्रण के बल जग ने सदा उसे रौंदा है
और वह नहीं बोली),
नहीं सुनें हम वह नगरी के नागरिकों से
जिन की भाषा में अतिशय चिकनाई है साबुन की
किन्तु नहीं है करुणा।
उठो, चलें, प्रिय!

Page No 19:

Question 2:

'मानव और समाज' विषय पर परिचर्चा कीजिए।

Answer:

मानव के जीवन में समाज का विशेष महत्व होता है। मानव ने ही समाज का निर्माण किया है। समाज में रहकर वह स्वयं का विकास करता है इसलिए उसे सामाजिक प्राणी कहा जाता है। समाज में रहकर उसकी हर प्रकार की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। उसका चरित्र निर्माण होता है। उसको अपने सुख-दुख बाँटने के लिए किसी न किसी की आवश्यकता होती है और समाज इसमें मुख्य भूमिका को निभाता है। पशु-पक्षियों का भी अपना समाज होता है। अतः हम समझ सकते हैं कि समाज कितना आवश्यक है। समाज में रहकर ही वह सभ्य कहलाता है। समाज उसके लिए उचित-अनुचित की सीमा तय करता है। उसके गलत कदमों को रोकता है तथा उसे उचित-अनुचित का ज्ञान करवाता है। जैसे यदि एक मनुष्य एक से अधिक विवाह करता है, तो समाज इसे अनैतिक बताते हुए उसे ऐसा करने से रोकता है। ऐसे बहुत से कार्य हैं, जिसे समाज द्वारा किया जाता है। समाज मानव के विकास के लिए कार्य करता है। यह ऐसी संस्था है, जो मानव द्वारा निर्मित है और मानव ही इसके अंग है। यदि इस पृथ्वी में मानव जाति का अंश न रहे, तो समाज भी नहीं रहेगा। दोनों सदियों से एक-दूसरे में मिले हुए कार्य करते आ रहे हैं।

Page No 19:

Question 3:

भारतीय दर्शन में 'सागर' और 'बूँद' का संदर्भ जानिए।

Answer:

भारतीय दर्शन का अर्थ भारत के अंदर किसी भी संप्रदाय, धर्म, जाति आदि के द्वारा किए गए विचार-विमर्श तथा चिंतन-मनन को कहते हैं। सदियों से भारत में विभिन्न धर्म, संप्रदाय तथा जातियों का उद्भव और विकास हुआ है। इनके मध्य आत्मा-परमात्मा, जन्म-मरण, स्वर्ग-नरक, सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, सुख-दुख इत्यादि विषयों पर चिंतन-मनन किया गया है। यह संचित ज्ञान दर्शन कहलाता है चूंकि यह भारतभूमि से संबंधित है। अत: इसे भारतीय दर्शन कहते हैं। यह मात्र हिन्दुत्व तक सीमित नहीं है। इसमें वेदों, उपनिषदों तथा आर्यों द्वारा वर्णित ज्ञान को रखना दूसरे धर्म तथा संप्रदाय के साथ अन्याय करना होगा। भारतीय दर्शन बहुत ही विशाल है। यह स्वयं सागर के समान है, जिसकी गहराई में जितने उतरते जाओ उतना ही ज्ञान भरा पड़ा है। परन्तु प्रश्न यह है कि भारतीय दर्शन में सागर और बूँद का किस संदर्भ में प्रयोग किया गया है? भारतीय दर्शनिकों ने सागर का प्रयोग संसार की विशालता, उसमें व्याप्त दुख, मोह इत्यादि को दर्शाने के लिए किया है। सागर का क्षेत्र विशाल और अनन्त है, उसमें अनगिनत जीव विद्यमान हैं, वैसे ही संसार का स्वरूप है। यह ऐसा स्थान है जहाँ आकर जीवात्मा कर्म करती हैं और उनके अनुसार फल पाती हैं। अत: भारतीय दर्शन शास्त्रियों ने संसार को सागर की संज्ञा दी है। कहीं-कहीं दुख को भी सागर के समान माना गया है। दार्शनिकों का मानना था कि सागर की तरह ही दुख का कोई अंत नहीं है। जीवात्मा दुख के दलदल में फंस कर दारूण ताप पाती है। वह मोह, वासना, प्रेम इत्यादि भावनाओं से ग्रस्त होकर जन्म-मरण के चक्र में फँसी रहती है। 'बूँद' को जीवात्मा या आत्मा के संदर्भ में प्रयोग किया गया है। सागर (संसार) में अनगिनत बूँद (जीवात्मा) विद्यमान है। जीवात्मा संसार रूपी सागर में अपने अस्तित्व के लिए प्रयासरत रहती है। कुछ बूँद स्वयं को स्थापित कर पाती हैं और मानवता का भला करती हैं और मुक्ति को प्राप्त हो जाती हैं। परन्तु अधिकतर जीवात्मा इस संसार रूपी सागर में फंसकर जन्म-मृत्यु के चक्र को भोगती रहती हैं।



View NCERT Solutions for all chapters of Class 16