NCERT Solutions for Class 12 Humanities Hindi Chapter 2 सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' are provided here with simple step-by-step explanations. These solutions for सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' are extremely popular among Class 12 Humanities students for Hindi सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' Solutions come handy for quickly completing your homework and preparing for exams. All questions and answers from the NCERT Book of Class 12 Humanities Hindi Chapter 2 are provided here for you for free. You will also love the ad-free experience on Meritnation’s NCERT Solutions. All NCERT Solutions for class Class 12 Humanities Hindi are prepared by experts and are 100% accurate.

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Question 1:

कंठ रुक रहा है, काल आ रहा है- यह भावना कवि के मन में क्यों आई?

Answer:

कवि का जीवन बहुत संघर्षपूर्ण रहा है। उसने बहुत ही कठिन हालतों का सामना किया है। जीवन में वेदना और दुख ने उसका कभी पीछा नहीं छोड़ा है। शोषक वर्गों के अत्याचार और शोषण ने उसे बहुत दुखी किया है। उसने जब भी विरोध किया है, उसकी आवाज़ को दबाया दिया गया है। उसने फिर भी हार नहीं मानी और इन सबसे लड़ता रहा है। परन्तु इन सब हालतों से लड़ते हुए उसके अंदर जीने की इच्छा समाप्त हो गई है और वह मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया है। और उसे प्रतीत हो रहा है कि उसका कंठ अब कुछ कहने में समर्थ नहीं है तथा उसकी मृत्यु समीप ही है।

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Question 2:

'ठग-ठाकुरों' से कवि का संकेत किसकी ओर है?

Answer:

कवि ठग-ठाकुरों शब्द कहकर समाज में व्याप्त धोखेबाज़ लोगों की ओर संकेत कर रहा है। उसके अनुसार इस प्रकार के लोग समाज में फैले हुए हैं। इनका निशाना गरीब किसान और मज़दूर वर्ग हैं। ये उनका लगातार शोषण करते हैं और उनका जीवन नरकीय बनाए हुए हैं। ये सामंती वर्ग के प्रतिनिधि हैं, जिनका उद्देश्य किसानों ओर मज़दूरों का खून चूसना है।

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Question 3:

'जल उठो फिर सींचने को' इस पंक्ति का भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए।

Answer:

यह पंक्ति निराशा और दुख से उभरने की प्रेरणा देती है। कवि के अनुसार मनुष्य को निराशा और दुख से उभरने के लिए एक बार फिर प्रयत्नशील होना चाहिए। यह कविता जहाँ उत्साह का संचार करती है, वहीं यह आशा भी बाँधती है कि संघर्ष से लड़कर निकला जा सकता है। अत: कवि लोगों को जीवन में निराशा और दुख से लड़ने के लिए प्रेरित कर उन्हें जीवन में आगे बढ़ने का मार्ग बताता है।

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Question 4:

प्रस्तुत कविता दुख और निराशा से लड़ने की शक्ति देती है? स्पष्ट कीजिए।

Answer:

प्रस्तुत कविता पढ़ने पर प्रेरणा का भाव संचारित होता है। कवि के अनुसार आज का समय दुख और निराशा से युक्त है। जीवन कठिन और संघर्षपूर्ण हो गया है। इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य संघर्ष के लिए तत्पर हो जाए। संघर्ष ही ऐसा मार्ग है जिसका हाथ पकड़कर कठिन समय से बाहर निकला जा सकता है।

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Question 1:

सरोज के नव-वधू रूप का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

Answer:

कवि के अनुसार उनकी पुत्री सरोज विवाह के समय कामदेव की पत्नी रति जैसी सुंदरी लग रही है। जब वह मंद-मंद करके हँसती है, तो लगता है मानो दामिनी (बिजली) उसके होठों के मध्य फँस गई है। विवाह की प्रसन्नता के कारण उसकी आँखों में चमक विद्यमान है। रूप और गुणों में वह अपनी माँ की प्रतिछाया प्रतित हो रही है। उसका सौंदर्य उसके अंग-प्रत्यंग में उच्छ्वास (गहरी छोड़ी गई साँस) के समान विकसित होकर फैल गया है। एक नई-नवेली दुल्हन की आँखें में व्याप्त लज्जा और संकोच उसकी आँखों को चमक से भर देता है तथा वे झुक जाती है। उनकी पुत्री की आँखें भी वैसी ही झुकी हुई तथा चमक से भरी हुई हैं। धीरे-धीरे वह चमक आँखों से उतरकर होठों पर फैल रही है। यह चमक उनकी पुत्री के होठों में स्वाभाविक कंपन पैदा कर रहा है।

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Question 2:

कवि को अपनी स्वर्गीया पत्नी की याद क्यों आई?

Answer:

कवि द्वारा अपनी पुत्री को विवाह के शुभ अवसर पर नव-वधू के रूप में देखकर अपनी स्वर्गीय पत्नी का स्मरण हो आया। दुल्हन के कपड़ों में उनकी पुत्री बहुत सुंदर प्रतीत हो रही है। उसके अंदर अपनी माँ की झलक दिखाई देती है। अपनी पत्नी के साथ मिलकर गायी गई कविताएँ उन्हें अपनी पुत्री सरोज के रूप में साकार होती दिखती है। वह सरोज को देखकर भाव-विभोर हो जाता है और उसे लगता है मानो उसकी पत्नी सरोज का रूप धारण कर सामने खड़ी हो। पुत्री को विवाह के समय शिक्षा देते समय भी कवि को अपनी पत्नी का स्मरण हो आता है। माँ विवाह के समय पुत्री को उसके सुखी गृहस्थ जीवन के लिए शिक्षा देती है परन्तु पत्नी की अनुपस्थिति में कवि को यह कार्य करना पड़ता है। ऐसे महत्वपूर्ण समय में पत्नी का अभाव उसे उसकी याद दिला देता है।

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Question 3:

'आकाश बदल कर बना मही' में 'आकाश' और 'मही' शब्द किसकी ओर संकेत करते हैं?

Answer:

ये शब्द कवि की श्रृंगार से पूर्ण कल्पनाओं तथा उसकी पुत्री सरोज की ओर संकेत करते हैं। कवि के अनुसार वह अपनी कविताओं में श्रृंगार भाव से युक्त कल्पनाएँ किया करता था। जब उसने नव-वधु के रूप में अपनी पुत्री को देखा, तो उसे लगा जैसे उसकी पुत्री के सौंदर्य में वह कल्पनाएँ साकार हो गई हैं और धरती पर उतर आयी हैं। अत: आकाश को वह श्रृंगार भाव से युक्त कल्पनाएँ तथा मही के रूप में अपनी पुत्री सरोज की ओर संकेत करता है।

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Question 4:

सरोज का विवाह अन्य विवाहों से किस प्रकार भिन्न था?

Answer:

सरोज का विवाह अन्य विवाहों की तरह चमक-दमक, शोर-शराबे से रहित था। सरोज का विवाह बहुत सादे तरीके से हुआ था। इस विवाह में समस्त रिश्तेदारों, मित्रों तथा पड़ोसियों को नहीं बुलाया गया था बल्कि यह परिवार के कुछ लोगों के मध्य ही संपन्न हुआ था। इसमें संगीत तथा मेहंदी जैसी रस्मों का अभाव था। किसी ने विवाह के गीत नहीं गाए न ही लोगों का ताँता लगा था। बस चारों तरफ़ शांति विराजमान थी। यह विवाह इसी शांति के मध्य हुआ था। माँ के अभाव में कवि ने ही माँ की ज़िम्मेदारी को निभाया तथा उसे कुल संबंधी नसीहतें दीं।

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Question 5:

शकुंतला के प्रसंग के माध्यम से कवि क्या संकेत करना चाहता है?

Answer:

शकुंतला कालिदास की एक पात्र है। जिसने कवि कालिदास की कृति अभिज्ञान शाकुंतलम को लोगों के हृदयों में सदा के लिए अमर कर दिया। शकुंतला ऋषि विश्वामित्र तथा अप्सरा मेनका की पुत्री है। मेनका शकुंतला को जन्म देकर तुरंत स्वर्ग को चली गई। जंगल में अकेली नवजात शिशु को देखकर कण्व ऋषि को दया आ गई और वे इसे अपने साथ ले आए। उन्होंने शकुंतला का लालन-पालन किया तथा पिता तथा माता की समस्त भूमिका निभाई। पुत्री की विदाई में कण्व ने भाव-विभोर होकर विलाप किया। शकुंतला की भांति ही सरोज की माता उसके बाल्यकाल में ही चल बसी। उसका लालन-पालन उसके ननिहाल में किया गया। वह बच्ची माता-पिता के प्रेम से वंचित रही। कण्व ऋषि के समान सूर्यकांत निराला जी ने सरोज के सयाने होने पर उसका विवाह कर दिया। सरोज की विदाई में निराला जी ने बहुत विलाप किया तथा मातृत्व के समस्त कर्तव्य निभाए। अत: निराला जी शकुंतला के माध्यम से अपनी पुत्री सरोज की ओर संकेत करते हैं।

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Question 6:

'वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली' पंक्ति के द्वारा किस प्रसंग को उद्घाटित किया गया है?

Answer:

कवि निराला जी इस पंक्ति के माध्यम से सरोज के लालन-पालन के प्रसंग को उद्घटित करते हैं। उनकी पत्नी मनोहारी जी के निधन के बाद उनकी पुत्री का लालन-पालन उनके नाना-नानी के द्वारा किया गया था। पहले मनोहारी लता रूप में वहाँ विकसित हुई अर्थात मनोहारी जी का जन्म वहाँ हुआ और अपने माता-पिता की देख-रेख में बड़ी हुई। à¤²à¤¤à¤¾ जब बड़ी हुई, तब तुम उस लता में कली के समान खिली अर्थात मनोहारी जी की संतान के रूप में सरोज ने जन्म लिया। परन्तु माँ की अकस्मात मृत्यु के बाद नाना-नानी की देख-रेख में युवावस्था को प्राप्त होकर एक युवती बनी। नाना-नानी के पास ही तुम्हारा समस्त बाल्यकाल बीता तथा वहीं तुमने युवावस्था में प्रवेश किया था।

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Question 7:

कवि ने अपनी पुत्री का तर्पण किस प्रकार किया?

Answer:

कवि अपनी पुत्री सरोज से बहुत प्रेम करता है। वह चाहता है कि मृत्यु के बाद का उसका समय कष्टपूर्ण न बीते। अत: वह उसकी सद्गति के लिए अपने सपूर्ण जीवन में कमाएँ गए सद्कर्मों को पुत्री के तर्पण करते समय अर्पित कर देते हैं। हिन्दू धर्म में श्राद्ध के समय तर्पण देने का रिवाज है। इस समय जल तथा अन्य सामग्री के साथ मरे व्यक्ति का तर्पण किया जाता है। कवि इसी समय अपनी पुत्री के लिए अपने सद्कर्मों रूपी भेंट अर्पित करता है। इस प्रकार एक पिता अपनी पुत्री को श्रद्धांजलि देता है।

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Question 8:

निम्नलिखित पंक्तियों का अर्थ स्पष्ट कीजिए-

(क) नत नयनों से लोक उतर

(ख) श्रृंगार रहा जो निराकार

(ग) पर पाठ अन्य यह, अन्य कला

(घ) यदि धर्म, रहे नत सदा माथ

Answer:

(क) कवि के अनुसार उसकी पुत्री विवाह के समय बहुत प्रसन्न है। नववधू बनी उसकी पुत्री की आँखें लज्जा तथा संकोच के कारण चमक रही है। कुछ समय पश्चात यह चमक आँखों से उतर कर उसके अधरों तक जा पहुँच जाती है।
 

(ख) इसका अर्थ है; ऐसा श्रृंगार जो बिना आकार के हो। कवि के अनुसार इस प्रकार का श्रृंगार ही रचनाओं में अपना प्रभाव छोड़ पाता है। कवि ने अपने द्वारा लिखी श्रृंगार रचनाओं में जिस सौंदर्य को अभिव्यक्त किया था, वह उन्हें नववधू बनी पुत्री के सौंदर्य में साकार होता दिखाई दिया।
 

(ग) इस पंक्ति में कवि को अपनी पुत्री को देखकर अभिज्ञान शकुंतलम् रचना की नायिका शकुंतला का ध्यान आ जाता है। उनकी पुत्री सरोज का माता विहिन होना, पिता द्वारा लालन-पालन करना तथा विवाह में माता के स्थान पर पिता द्वारा माता के कर्तव्यों का निर्वाह करना शकुंतला से मिलता है। परन्तु उसका व्यवहार और शिक्षा में सरोज शकुंतला से बहुत अधिक अलग थी। अत: वह कहता है यह पाठ अलग है परन्तु कहीं पर यह मिलता है और कहीं अन्य विषयों पर यह बिलकुल अलग हो जाता है।
 

(घ) प्रस्तुत पंक्ति में कवि अपने पिता धर्म को निभाने के लिए दृढ़ निश्चयी है। वह अपने पिता धर्म का पालन सदा माथा झुकाए करना चाहता है।

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Question 1:

निराला के जीवन से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए रामविलास शर्मा की कविता 'महाकवि निराला' पढ़िए।

Answer:

अपने पुस्तकालय से इस कविता को लेकर पढ़ें।

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Question 2:

अपने बचपन की स्मृतियों को आधार बनाकर एक छोटी सी कविता लिखने का प्रयास कीजिए।

Answer:

हल्के हरे रंग सी तितली,
एक नहीं असंख्य उड़ी।
मैं उनके मध्य उड़ी,
नहीं उड़ी तो, ले उनको उड़ी
माचिस की डिब्बिया में भर,
कूद-कूद के मैं हूँ उड़ी,
हँसी और उत्साह ह्दय में लेकर
घर के छज्जे में हूँ खड़ी
बहुत सही तुमने पराधीनता,
अब उड़ चलो अपनी नगरी,
मैं यह कहकर उनके साथ उछली।

                                          सावित्री

(नोटः मित्र हमने स्वयं एक कविता लिखकर दी है। इस प्रकार आप अपनी बचपन की स्मृतियों पर कविता लिखिए।)

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Question 3:

'सरोज स्मृति' पूरी पढ़कर आम आदमी के जीवन-संघर्षों पर चर्चा कीजिए।

Answer:

'सरोज स्मृति' को पढ़कर पता चलता है कि आम आदमी का जीवन कितना कष्ट भरा है। कहीं धन का अभाव है, तो कहीं अपनों के प्रेम की कमी। एक आम आदमी का जीवन घर, कार्यालय, बिजली-पानी-भोजन की व्यवस्था में निकल जाता है। बच्चों की शिक्षा, उनका भविष्य तथा विवाह से संबंधित खर्चों के नीचे वह स्वयं को दबा पाता है। एक घर लेने के लिए उसे एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है और यदि वह घर ले लेता है, तो उसे जीवनभर कर्ज का बोझ दबा देता है। ऐसी स्थिति में घर और बच्चों की आवश्यकताओं के लिए वह कोल्हू का बैल बन जाता है। जिनके लिए वह यह सब कर रहा है यदि ईश्वर ही उन्हें अपने पास बुला ले तो मनुष्य का ह्दय चित्कार उठता है। 'सरोज स्मृति' आम आदमी के जीवन-संघर्षों का प्रमाण है। कवि अपनी गिरती आर्थिक स्थिति के कारण पिता का कर्तव्य नहीं निभा पाता। मातृविहिन अपनी संतान को अपने से अलग रखता है। यद्यपि उसकी संतान को उसके नाना-नानी का समस्त प्यार-दुलार मिलता है लेकिन यह काफी नहीं है। यदि कवि के जीवन में धन का अभाव नहीं होता, तो वह अपनी संतान को अपने साथ रख पाता तथा उसका विवाह बड़े धूमधाम से कर पाता। अपनी पुत्री का विवाह धन के अभाव में न कर पाने के कारण कवि का हृदय दुखी होता दिखाई देता तथा पत्नी के बाद पुत्री की मृत्यु उसे अंदर तक तोड़ देती है। वह विवश हो उठता है। अपने प्रेम को अपनी संतान के समक्ष रख नहीं पाता और उसकी वेदना से उपजी यह कविता हमारे समक्ष आ खड़ी होती है। हर मनुष्य के जीवन में ऐसे संघर्ष भरे पल विद्यमान होते हैं।



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