NCERT Solutions for Class 12 Humanities Hindi Chapter 3 कुँवर नारायण (कविता के बहाने, बात सीधी थी पर) are provided here with simple step-by-step explanations. These solutions for कुँवर नारायण (कविता के बहाने, बात सीधी थी पर) are extremely popular among Class 12 Humanities students for Hindi कुँवर नारायण (कविता के बहाने, बात सीधी थी पर) Solutions come handy for quickly completing your homework and preparing for exams. All questions and answers from the NCERT Book of Class 12 Humanities Hindi Chapter 3 are provided here for you for free. You will also love the ad-free experience on Meritnation’s NCERT Solutions. All NCERT Solutions for class Class 12 Humanities Hindi are prepared by experts and are 100% accurate.

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Question 1:

इस कविता के बहाने बताएँ कि 'सब घर एक कर देने के माने' क्या है?

Answer:

सब घर एक देने के माने का अर्थ है कि सभी को अपना घर बना लेना। बच्चों के लिए अपना-पराया कुछ नहीं होता है। जहाँ उन्हें प्यार मिलता है, वे वहीं के हो जाते हैं। यही कारण है कि बच्चे पड़ोसियों के साथ भी वैसे ही रहते हैं, जैसे अपने माता-पिता के साथ रहते हैं। वे किसी सीमा को नहीं समझते हैं। वे उन सीमाओं को तोड़कर एकता स्थापित कर देते हैं। ऐसे ही कविताएँ होती हैं। कविता यह नहीं देखती कि उसे हिन्दू पढ़ रहा है या अन्य कोई धर्म या जाति का व्यक्ति। वे सारी सीमाएँ तोड़कर प्रेम तथा एकता का सूत्र कायम कर देती हैं। वे समाज तथा सभी देशों की सीमाओं को एकसूत्र में पिरो देती हैं।

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Question 2:

'उड़ने' और 'खिलने' का कविता से क्या संबंध बनता है?

Answer:

पक्षी आकाश में उड़ते हैं तथा फूल जगह-जगह खिलते हैं। कविता में पक्षियों के समान उड़ने की तथा फूल के समान खिलने की विशेषता होती है। लेकिन ये विशेषताएँ उसे किसी सीमा में नहीं बाँधती। ये विशेषताएँ उसे गहराई तथा व्यापकता देती है। पक्षी एक समय तक ही उड़ सकते हैं तथा फूल खिलकर समाप्त हो जाते हैं लेकिन कविता में ऐसा नहीं होता है। वह अपने निर्माण के साथ ही उड़ान भरती है और सदियों तक इस उड़ान को कायम रखती है, वह फूल के समान स्वरूप पाकर खिलती है। उसका खिलना एक समय के लिए नहीं होता बल्कि वह भी सदियों तक खिलकर लोगों के हृदय को आनंदित करती है। इसलिए 'उड़ने' और 'खिलने' का कविता से गहरा संबंध बनता है।

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Question 3:

कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं?

Answer:

कविता और बच्चों में समानांतर रखने के निम्नलिखित कारण हैं-
(क) बच्चों के समान कविता में शब्दों की कोई सीमा नहीं होती है। जैसे बच्चे खेलते समय सारी सीमाएँ तोड़ देते हैं, वैसे ही कविता भी सारी सीमाएँ तोड़ देती है।
(ख) बच्चे किसी सीमा को नहीं मानते। उनके लिए कोई अपना-पराया नहीं होता है। सब उनके अपने होते हैं। ऐसे ही कविता के लिए कोई अपना-पराया नहीं होता है। वे सभी के लिए होती है।
(ग) जिस प्रकार बच्चों की कल्पनाएँ अनंत होती हैं, वैसे ही कवि की कल्पनाओं का अनंत रूप कविता होती है।

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Question 4:

कविता के संदर्भ में 'बिना मुरझाए महकने के माने' क्या होते हैं?

Answer:

फूल ही ऐसे हैं, जो महकते हैं। लेकिन उनका महकना तब तक कायम रहता है, जब तक उनका अस्तित्व विद्यमान है। कविता की स्थिति ऐसी नहीं है। कवि ने उसे खिलने तथा कभी न मुरझाने की शक्ति प्रदान की है। इस कारण उसकी महक सदैव बनी रहती है। उसे आप जब भी पढ़ो वह आपको नयी ही प्रतीत होती है। कविता का प्रभाव तथा अस्तित्व चिरस्थायी रहता है। इसलिए कविता को बिना मुरझाए महकने के लिए कहा है।

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Question 5:

'भाषा को सहूलियत' से बरतने से क्या अभिप्राय है?

Answer:

इसका अभिप्राय है कि हमें भाषा का प्रयोग उचित प्रकार से करना चाहिए। भाषा शब्दों का ताना-बाना है। उनके अर्थ प्रसंगगत होते हैं। अतः हमें उसका प्रयोग सही प्रकार से करना चाहिए। कई बार हम गलत शब्द का प्रयोग कर भाषा को पेचिदा बना देते हैं। इसलिए कहा गया है कि भाषा को सहूलियत के साथ बरतना चाहिए। जितना आवश्यक हो उतना ही बोलना चाहिए। अत्यधिक बोलना भी भाषा को विचित्रता दे देता है। हम बोलने में भूल ही जाते हैं कि हम क्या बोल रहे हैं। अतः बोलते समय अधिक सावधानी रखें।

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Question 6:

बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं, किंतु कभी-कभी भाषा के चक्कर में 'सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है' कैसे?

Answer:

यह सही है कि बात और भाषा आपस में जुड़े हुए हैं। जब हम किसी से बात करते हैं, तो भाषा ही वह माध्यम हैं, जिससे हम अपनी बात दूसरों को समझा सकते हैं। यदि भाषा नहीं है, तो हम बात नहीं कर सकते हैं। यदि हम किसी के साथ बात ही नहीं करेंगे, तो भाषा का प्रयोग नहीं होगा। अतः यह अटूट संबंध है। जब हम अपनी भाषा को सहजता से इस्तेमाल नहीं करते तो यह स्थिति आती है कि सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है। हर शब्द की विशेषता है कि उसका अपना अलग अर्थ होता है। फिर चाहे वह देखने में किसी के समान अर्थ देने वाले क्यों न लगे। उदाहरण के लिए-
तुम्हारा आचार सड़ गया है।
इस वाक्य में 'आचार' शब्द का गलत प्रयोग किया गया है। इस शब्द का अर्थ व्यवहार है। यह अचार के समान लगता है। लेकिन वाक्य को ध्यानपूर्वक देखा जाए, तो यहाँ पर आम, गोभी से बनने वाले व्यंजन की बात की जा रही है। लेकिन गलत शब्द का प्रयोग करके हमने सीधी बात को टेढ़ा बना दिया है।

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Question 7:

बात (कथ्य) के लिए नीचे दी गई विशेषताओं का उचित बिंबों/मुहावरों से मिलान करें।

 

बिंब/मुहावरा विशेषता
 (क) बात की चूड़ी मर जाना  कथ्य और भाषा सही सामंजस्य बनना
 (ख) बात की पेंच खोलना  बात का पकड़ में न आना
 (ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलना  बात का प्रभावहीन हो जाना
 (घ) पेंच को कील की तरह ठोंक देना  बात में कसावट का न होना
 (ङ) बात का बन जाना  बात को सहज और स्पष्ट करना

Answer:

बिंब/मुहावरा विशेषता
 (क) बात की चूड़ी मर जाना  बात का प्रभावहीन हो जाना
 (ख) बात की पेंच खोलना  बात को सहज और स्पष्ट करना
 (ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलना  बात का पकड़ में न आना
 (घ) पेंच को कील की तरह ठोंक देना  बात में कसावट का न होना
 (ङ) बात का बन जाना  कथ्य और भाषा सही सामंजस्य बनना



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Question 1:

❖ बात से जुड़े कई मुहावरे प्रचलित हैं। कुछ मुहावरों का प्रयोग करते हुए लिखें।

Answer:

क) बात बनना- काम बन जाना- कल लड़के वाले आए थे। लगता है नेहा की बात बन गई है।
ख) बात का बतंगड़ बनाना- छोटी बात को बड़ी बना देना- गगन ने तो बात का बतंगड़ बना दिया है।
ग) बात का धनी होना- जुबान का पक्का- रोहन बात का धनी है। जो बोल दिया वह करके रहता है।
घ) बातें बनाना- यहाँ की वहाँ लगाना- लोगों को तो हमेशा बातें बनाने के लिए मिलना चाहिए।
ङ) बात बिगड़ना- काम खराब होना- तुमने बनाई बात बिगाड़ दी।

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Question 1:

❖ ज़ोर ज़बरदस्ती से

बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।

Answer:

प्रस्तुत पंक्तियों के माध्यम से कवि कहना चाहता है कि हमें बोलते समय भाषा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मात्र अपनी बात कहने के लिए कुछ भी नहीं कहना चाहिए। भाषा में अनावश्यक शब्दों का प्रयोग करने से बात का महत्व समाप्त हो जाता है। इस तरह बात बिगड़ जाती है। एक पेंच को कसते समय हमारे द्वारा की गई ज़बरदस्ती पेंच की चूड़ी को खराब कर देता है, वैसे ही बात करते समय भाषा में किए गए अनावश्यक शब्दों के प्रयोग से बात का सही अर्थ नहीं निकल पाता है। अपनी बात को समझाने के लिए हमें उचित शब्दों का ही प्रयोग करना चाहिए। इस तरह हमारी बात प्रभावी बनती है और लोगों को समझ में आती है। लेकिन ज़बरदस्ती भाषा को प्रभावी बनाने के चक्कर में सही बात भी स्पष्ट नहीं हो पाती है।

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Question 1:

❖ आधुनिक युग में कविता की संभावनाओं पर चर्चा कीजिए?

Answer:

आधुनिक युग में कविताओं में संभावनाएँ-
(क) अभिव्यक्ति को सहज और सुंदर रूप से व्यक्ति करना।
(ख) कविताओं को यथार्थ से और भी समीप से जोड़ना।
(ग) कविता की भाषा शैली और शिल्प शैली में बदलाव करना।
(घ) कविता में अलंकारों और छंदों के स्वरूप में नए बदलाव।

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Question 2:

❖ चूड़ी, कील, पेंच आदि मूर्त्त उपमानों के माध्यम से कवि ने कथ्य की अमूर्त्तता को साकार किया है। भाषा को समृद्ध एवं संप्रेषणीय बनाने में, बिबों और उपमानों के महत्त्व पर परिसंवाद आयोजित करें।

Answer:

भाषा को समृद्ध एवं संप्रेषणीय बनाने में बिबों और उपमानों के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है। ये ही कविता के स्वरूप को साकार करते हैं। इनके द्वारा ही कवि की बात प्रभावी बनती है और वह क्या कहना चाहता है, यह स्पष्ट होता है। 'बिंब' का अर्थ होता है, शब्दों के माध्यम से कविता में ऐन्द्रिय चित्र दर्शाना। कविता में इसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके द्वारा कवि अपनी कल्पनाशक्ति का प्रयोग कर अपने सूक्ष्म विचारों को एक चित्र के रूप में दर्शाता है। यह चित्र कविता पढ़ते समय हमारी आँखों के आगे साकार हो जाता है। उपमान का प्रयोग करके कवि भाषा को सरल, सहज बना देता है। इससे भाषा में शब्दांडबर खत्म हो जाता है और कविता अपने उद्देश्य की पूर्ति कर लेती है।

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Question 1:

सुंदर है सुमन, विहग सुंदर
मानव तुम सबसे सुंदरतम।

पंत की इस कविता में प्रकृति की तुलना में मनुष्य को अधिक सुंदर और समर्थ बताया गया है 'कविता के बहाने' कविता में से इस आशय को अभिव्यक्त करने वाले बिंदुओं की तलाश करें।

Answer:

निम्नलिखित बिंदु दी गई कविता के आशय को अभिव्यक्त करते हैं-

(क) कविता के पंख लगा उड़ने के माने

चिड़िया क्या जाने?

(ख) बिना मुरझाए महकने के माने
फूल क्या जाने?

(ग) सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने!

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Question 2:

प्रतापनारायण मिश्र का निबंध 'बात' और नागार्जुन की कविता 'बातें' ढूँढ़ कर पढ़ें।

Answer:

बात
यदि हम वैद्य होते तो कफ और पित्त के सहवर्ती बात की व्‍याख्‍या करते तथा भूगोलवेत्ता होते तो किसी देश के जल बात का वर्णन करते। किंतु इन दोनों विषयों में हमें एक बात कहने का भी प्रयोजन नहीं है। इससे केवल उसी बात के ऊपर दो चार बात लिखते हैं जो हमारे सम्‍भाषण के समय मुख से निकल-निकल के परस्‍पर हृदयस्‍थ भाव प्रकाशित करती रहती है। सच पूछिए तो इस बात की भी क्या बात है जिसके प्रभाव से मानव जाति समस्‍त जीवधारियों की शिरोमणि (अशरफुल मखलूकात) कहलाती है। शुकसारिकादि पक्षी केवल थोड़ी सी समझने योग्‍य बातें उच्‍चरित कर सकते हैं इसी से अन्‍य नभचारियों की अपेक्षा आद्रित समझे जाते हैं। फिर कौन न मान लेगा कि बात की बड़ी बात है। हाँ, बात की बात इतनी बड़ी है कि परमात्‍मा को सब लोग निराकार कहते हैं तौ भी इसका संबंध उसके साथ लगाए रहते हैं। वेद ईश्‍वर का बचन है, कुरआनशरीफ कलामुल्‍लाह है, होली बाइबिल वर्ड आफ गाड है यह बचन, कलाम और वर्ड बात ही के पर्याय हैं सो प्रत्‍यक्ष में मुख के बिना स्थिति नहीं कर सकती। पर बात की महिमा के अनुरोध से सभी धर्मावलंबियों ने "बिन बानी वक्‍त बड़ योगी" वाली बात मान रक्‍खी है। यदि कोई न माने तो लाखों बातें बना के मनाने पर कटिबद्ध रहते हैं।
यहाँ तक कि प्रेम सिद्धांती लोग निरवयव नाम से मुँह बिचकावैंगे। 'अपाणिपादो जवनो गृहीता' इत्‍यादि पर हठ करने वाले को यह कहके बात में उड़ावेंगे कि "हम लँगड़े लूले ईश्‍वर को नहीं मान सकते। हमारा प्‍यारा तो कोटि काम सुंदर श्‍याम बरण विशिष्‍ट है।" निराकार शब्‍द का अर्थ श्री शालिग्राम शिला है जो उसकी स्‍यामता को द्योतन करती है अथवा योगाभ्‍यास का आरंभ करने वाले कों आँखें मूँदने पर जो कुछ पहिले दिखाई देता है वह निराकार अर्थात् बिलकुल काला रंग है। सिद्धांत यह कि रंग रूप रहित को सब रंग रंजित एवं अनेक रूप सहित ठहरावेंगे किंतु कानों अथवा प्रानों वा दोनों को प्रेम रस से सिंचित करने वाली उसकी मधुर मनोहर बातों के मजे से अपने को बंचित न रहने देंगे।
जब परमेश्‍वर तक बात का प्रभाव पहुँचा हुआ है तो हमारी कौन बात रही? हम लोगों के तो "गात माहिं बात करामात है।" नाना शास्‍त्र, पुराण, इतिहास, काव्‍य, कोश इत्‍यादि सब बात ही के फैलाव हैं जिनके मध्‍य एक-एक ऐसी पाई जाती है जो मन, बुद्धि, चित्त को अपूर्व दशा में ले जाने वाली अथच लोक परलोक में सब बात बनाने वाली है। यद्यपि बात का कोई रूप नहीं बतला सकता कि कैसी है पर बुद्धि दौड़ाइए तो ईश्‍वर की भाँति इसके भी अगणित ही रूप पाइएगा।
बड़ी बात, छोटी बात, सीधी बात, टेढ़ी बात, खरी बात, खोटी बात, मीठी बात, कड़वी बात, भली बात, बुरी बात, सुहाती बात, लगती बात इत्‍यादि सब बात ही तो है? बात के काम भी इसी भाँति अनेक देखने में आते हैं। प्रीति बैर, सुख दु:ख श्रद्धा घृणा, उत्‍साह अनुत्‍साहादि जितनी उत्तमता और सहजतया बात के द्वारा विदित हो सकते हैं दूसरी रीति से वैसी सुविधा ही नहीं। घर बैठे लाखों कोस का समाचार मुख और लेखनी से निर्गत बात ही बतला सकती है। डाकखाने अथवा तारघर के सारे से बात की बात में चाहे जहाँ की जो बात हो जान सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त बात बनती है, बात बिगड़ती है, बात आ पड़ती है, बात जाती रहती है, बात उखड़ती है।
हमारे तुम्‍हारे भी सभी काम बात पर निर्भर करते हैं - "बातहि हाथी पाइए, बातहि हाथी पाँव।" बात ही से पराए अपने और अपने पनाए हो जाते हैं। मक्‍खीचूस उदार तथा उदार स्‍वल्‍पव्‍ययी, कापुरुष युद्धोत्‍साही एवं युद्धप्रिय शांतिशील, कुमार्गी सुपथगामी अथच सुपंथी कुराही इत्‍यादि बन जाते हैं। बात का तत्‍व समझना हर एक का काम नहीं है और दूसरों की समझ पर आधिपत्‍य जमाने योग्‍य बात बढ़ सकता भी ऐसों वैसों का साध्‍य नहीं है। बड़े-बड़े विज्ञवरों तथा महा-महा कवीश्‍वरों के जीवन बात ही के समझने समझाने में व्‍यतीत हो जाते हैं। सहृदयगण की बात के आनंद के आगे सारे संसार तुच्‍छ जँचता है। बालाकों की तोतली बातें, सुंदरियों की मीठी-मीठी, प्‍यारी-प्‍यारी बातें, सत्‍कवियों की रसीली बातें, सुवक्‍ताओं की प्रभावशाली बातें जिसके जी को और का और न कर दें उसे पशु नहीं पाषाण खंड कहना चाहिए। क्‍योंकि कुत्ते, बिल्‍ली आदि को विशेष समझ नहीं होती तो भी पुचकार के 'तू तू' 'पूसी पूसी' इत्‍यादि बातें क दो तो भावार्थ समझ के यथा सामर्थ्‍य स्‍नेह प्रदर्शन करने लगते हैं। फिर वह मनुष्‍य कैसा जिसके चित्त पर दूसरे हृदयवान की बात का असर न हो।
बात वह आदणीय है कि भलेमानस बात और बाप को एक समझते हैं। हाथी के दाँत की भाँति उनके मुख से एक बार कोई बात निकल आने पर फिर कदापि नहीं पलट सकती। हमारे परम पूजनीय आर्यगण अपनी बात का इतना पक्ष करते थे कि "तन तिय तनय धाम धन धरनी। सत्‍यसंध कहँ तून सम बरनी"। अथच "प्रानन ते सुत अधिक है सुत ते अधिक परान। ते दूनौ दसरथ तजे वचन न दीन्‍हों जान।" इत्‍यादि उनकी अक्षरसंवद्धा कीर्ति सदा संसार पट्टिका पर सोने के अक्षरों से लिखी रहेगी। पर आजकल के बहुतेरे भारत कुपुत्रों ने यह ढंग पकड़ रक्‍खा है कि 'मर्द की जबान (बात का उदय स्‍थान) और गाड़ी का पहिया चलता ही फिरता रहता है।'
आज और बात है कल ही स्‍वार्थांधता के बंश हुजूरों की मरजी के मुवाफिक दूसरी बातें हो जाने में तनिक भी विलंब की संभावना नहीं है। यद्यपि कभी-कभी अवसर पड़ने पर बात के अंश का कुछ रंग ढंग परिवर्तित कर लेना नीति विरुद्ध नहीं है, पर कब? जात्‍योपकार, देशोद्धार, प्रेम प्रचार आदि के समय, न कि पापी पेट के लिए। एक हम लोग हैं जिन्‍हें आर्यकुलरत्‍नों के अनुगमन की सामर्थ्य नहीं है। किंतु हिंदुस्‍तानियों के नाम पर कलंक लगाने वालों के भी सहमार्गी बनने में घिन लगती है।
इससे यह रीति अंगीकार कर रखी है कि चाहे कोई बड़ा बतकहा अर्थात् बातूनी कहै चाहै यह समझे कि बात कहने का भी शउर नहीं है किंतु अपनी मति अनुसार ऐसी बातें बनाते रहना चाहिए जिनमें कोई न कोई, किसी न किसी के वास्‍तविक हित की बात निकलती रहे। पर खेद है कि हमारी बातें सुनने वाले उँगलियों ही पर गिनने भर को हैं। इससे "बात बात में वात" निकालने का उत्‍साह नहीं होता। अपने जी को 'क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने' इत्‍यादि विदग्‍धालापों की लेखनी से निकली हुई बातें सुना के कुछ फुसला लेते हैं और बिन बात की बात को बात का बतंगड़ समझ के बहुत बात बढ़ाने से हाथ समेट लेना ही समझते हैं कि अच्‍छी बात है।
(प्रताप नारायण मिश्र)
 
बातें
हँसी में धुली हुईं
सौजन्य चंदन में बसी हुई
बातें–
चितवन में घुली हुईं
व्यंग्य-बंधन में कसी हुईं
बातें–
उसाँस में झुलसीं
रोष की आँच में तली हुईं
बातें–
चुहल में हुलसीं
नेह–साँचे में ढली हुईं
बातें–
विष की फुहार–सी
बातें–
अमृत की धार–सी
बातें–
मौत की काली डोर–सी
बातें–
जीवन की दूधिया हिलोर–सी
बातें–
अचूक वरदान–सी
बातें–
घृणित नाबदान–सी
बातें–
फलप्रसू, सुशोभन, फल–सी
बातें–
अमंगल विष–गर्भ शूल–सी
बातें–
क्य करूँ मैं इनका?
मान लूँ कैसे इन्हें तिनका?
बातें–
यही अपनी पूंजी¸ यही अपने औज़ार
यही अपने साधन¸ यही अपने हथियार
बातें–
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
बना लूँ वाहन इन्हें घुटन का, घिन का?
क्या करूँ मैं इनका?
बातें–
साथ नहीं छोड़ेंगी मेरा
स्तुति करूँ रात की, जिक्र न करूँ दिन का?
क्या करूँ मैं इनका?
(नागार्जुन)



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