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Board Paper of Class 10 2006 Hindi Delhi(SET 1) - Solutions

(i) इस प्रश्न-पत्र के चार खण्ड हैं क, ख, ग और घ।
(ii) चारों खण्डों के प्रश्नों के उत्तर देना अनिवार्य है।
(iii) यथासंभव प्रत्येक खण्ड के उत्तर क्रमश: दीजिए।
  • Question 1

    निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

    तत: किम्। मैं हैरान होकर सोचता हूँ कि मनुष्य आज अपने बच्चों को नाखून न काटने के लिए डाँटता है किसी दिन-कुछ थोड़े लाख वर्ष पूर्व-वह अपने बच्चों को नाखून नष्ट करने पर डाँटता रहा होगा। लेकिन प्रकृति है कि वह अब भी नाखून को जिलाए जा रही है और मनुष्य है कि वह अब भी उसे काटे जा रहा है। कमबख्त रोज़ बढ़ते हैं, क्योंकि वे अंधे हैं, नहीं जानते कि मनुष्य को इससे कोटि-कोटि गुना शक्तिशाली अस्त्र मिल चुका है! मैं मनुष्य के नाखून की ओर देखता हूँ, तो कभी-कभी निराश हो जाता हूँ। ये उसकी भयंकर पाशवी वृत्ति के जीवंत प्रतीक हैं। मनुष्य की पशुता को जितनी बार भी काट दो, वह मरना नहीं जानती।

    मानव-शरीर का अध्ययन करने वाले प्राणी विज्ञानियों का निश्चित मत है कि मानव-चित्त की भाँति मानव-शरीर में भी बहुत-सी अभ्यासजन्य सहज वृत्तियाँ रह गई हैं। उसे दीर्घकाल तक उनकी आवश्यकता रही है। अतएव शरीर ने अपने भीतर एक ऐसा गुण पैदा कर लिया है कि वे वृत्तियाँ अनायास ही, और शरीर के अनजान में भी, अपने-आप काम करती हैं। नाखून का बढ़ना उसमें से एक है, केश का बढ़ना दूसरा है, दाँत का दुबारा उठना तीसरा है, पलकों का गिरना चौथा है और असल में सहजात वृत्तियाँ अनजान की स्मृतियों को ही कहते हैं। हमारी भाषा में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। अगर आदमी अपने शरीर की, मन की और वाक् की अनायास ही घटने वाली वृत्तियों के विषय में विचार करे, तो उसे अपनी वास्तविक प्रवृत्ति पहचानने में बहुत सहायता मिले। पर कौन सोचता है? सोचना तो क्या, उसे इतना भी पता नहीं चलता कि उसके भीतर नख बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उन्हें काटने की जो प्रवृत्ति है, वह उसके मनुष्यता की निशानी है और यद्यपि पशुत्व के चिह्न उसके भीतर रह गए हैं, पर वह पशुत्व को छोड़ चुका है। पशु बनकर वह आगे नहीं बढ़ सकता। उसे कोई और रास्ता खोजना चाहिए। अस्त्र बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुष्यता की विरोधनी है।

    मेरा मन पूछता है–किस ओर? मनुष्य किस ओर बढ़ रहा है? पशुता की ओर या मनुष्यता की ओर? अस्त्र बढ़ाने की ओर या अस्त्र काटने की ओर? मेरी निर्बोध बालिका ने मानी मनुष्य-जाति से ही प्रश्न किया है–जानते हो, नाखून क्यों बढ़ते हैं? यह हमारी पशुता के अवशेष हैं। मैं भी पूछता हूँ–जानते हो, ये अस्त्र-शस्त्र क्यों बढ़ रहे हैं? ये हमारी पशुता की निशानी हैं। भारतीय भाषाओं में प्राय: ही अंग्रेज़ी के 'इंडिपेंडेंस' का अर्थ है अनधीनता या किसी की अधीनता का अभाव, पर 'स्वाधीनता' शब्द का अर्थ है अपने ही अधीन रहना। अंग्रेज़ी में कहना हो, तो 'सेल्फ़डिपेंडेस' कह सकते हैं। मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि इतने दिनों तक अंग्रेज़ी की अनुवर्तिता करने के बाद भी भारतवर्ष 'इंडिपेंडेंस' को अनधीनता क्यों नहीं कह सका? उसने अपनी आज़ादी के जितने भी नामकरण किए – स्वतंत्रता, स्वराज, स्वाधीनता – उन सबमें 'स्व' का बंधन अवश्य रखा। यह क्या संयोग की बात है या हमारी समूची परंपरा ही अनजान में, हमारी भाषा के द्वारा प्रकट होती रही है? हमारा इतिहास बहुत पुराना है, हमारे शास्त्रों में इस समस्या को नाना भावों और नाना पहलुओं में विचारा गया है। हम कोई नौसिखुए नहीं हैं, जो रातों-रात अनजान जंगल में पहुँचाकर अरक्षित छोड़ दिए गए हों। हमारी परंपरा महिमामयी, उत्तराधिकार विपुल और संस्कार उज्ज्वल है। हमारे अनजान में भी ये बातें हमें एक खास दिशा में सोचने की प्रेरणा देती हैं। यह ज़रुर है कि परिस्थितियाँ बदल गई हैं। उपकरण नए हो गए हैं और उलझनों की मात्रा भी बहुत बढ़ गई है, पर मूल समस्याएँ बहुत अधिक नहीं बदली हैं। भारतीय चित्त जो आज भी 'अनधीनता' के रुप में न सोचकर 'स्वाधीनता' के रुप में सोचता है, वह हमारे दीर्घकालीन संस्कारों का फल है। वह 'स्व' के बंधन को आसानी से नहीं छोड़ सकता। अपने आप पर अपने-आपके द्वारा लगाया हुआ बंधन हमारी संस्कृति की बड़ी भारी विशेषता है। मैं ऐसा तो नहीं मानता कि जो कुछ हमारा पुराना है, जो कुछ हमारा विशेष है, उससे हम चिपटे ही रहें। पुराने का 'मोह' सब समय वाँछनीय ही नहीं होता। मेरे बच्चे को गोद में दबाए रहने वाली 'बंदरिया' मनुष्य का आदर्श नहीं बन सकती।

    (i) प्राचीन काल में मनुष्य बच्चों को नाखून नष्ट करने के लिए क्यों डाँटता होगा? (2)

    (ii) नाखून मनुष्य की किस वृत्ति के प्रतीक हैं? (2)

    (iii) क्या 'स्व' का बंधन हमारी संस्कृति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता कही जा सकती है? इसका कारण स्पष्ट कीजिए। (2)

    (iv) स्पष्ट करें कि पुराने का मोह प्रत्येक समय वाँछनीय नहीं होता। (2)

    (v) उपरोक्त गद्यांश का शीर्षक लिखिए। (2)

    (vi) उपरोक्त गद्यांश में से कोई दो भाववाचक संज्ञाएँ छाँटकर लिखिए। (2)

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  • Question 2

    निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए –
    यह समन्दर की पछाड़
    तोड़ती है हाड़ तट का-
    अति कठोर पहाड़
    पी गया हूं दृश्य वर्षा का:
    हर्ष बादल का
    हृदय में भरकर हुआ हूँ हवा सा हलका:
    धुन रही थीं सर
    व्यर्थ व्याकुल मत्त लहरें
    वहीं आ-आकर
    जहाँ था मैं खड़ा
    मौन:
    समय के आघात से पोली, खड़ी दीवारें
    जिस तरह छहरें
    एक के बाद एक, सहसा।
    चांदनी की उँगलियाँ चंचल
    क्रोशिये-सी बुन रही थी चपल
    फेन-झालर बेल, मानो।
    पंक्तियों में टूटती-गिरती
    चांदनी में लोटती लहरें
    बिजलियों-सी कौंधती लहरें
    मछलियों-सी बिछल पड़ती तड़पती लहरें
    बार-बार
    स्वप्न में रौंदी हुई सी विकल-सिकता
    पुतलियों-सी मूंद लेती
    आँख।
    वह समन्दर की पछाड़
    तोड़ती है हाड़ का तट का-
    अति कठोर पहाड़।
    यह समन्दर की पछाड़।

    (i) सागर तट का हाड़ किसे कहा गया है? (1)

    (ii) 'हवा सा हल्का' होने से कवि का क्या आशय है? (1)

    (iii) लहरों की उपमा बिजलियों और मछलियों से क्यों दी गई है? (2)

    (iv) कवि की अतिशय आनंदानुभूति का कारण स्पष्ट कीजिए। (2)

    (v) इस कविता के आधार पर समुद्र की लहरों के सौंदर्य का वर्णन कीजिए। (2)

    अथवा

    "बात सीधी थी पर एक बार
    भाषा के चक्कर में
    ज़रा टेढ़ी फँस गई।
    उसे पाने की कोशिश में
    भाषा को उलटा पलटा
    तोड़ा मरोड़ा
    घुमाया फिराया
    कि बात या तो बने
    या फिर भाषा से बाहर आए-
    लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
    बात और भी पेचीदा होती चली गई।
    सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
    मैं पेंच को खोलने के बजाए
    उसे बेतरह कसता चला जा रहा था।
    क्यों कि इस करतब पर मुझे
    साफ़ सुनाई दे रही थी
    तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह।

    (i) सीधी सी बात में टेढ़ापन क्यों आ गया? (1)

    (ii) बात और भी पेचीदा क्यों हो गई? (2)

    (iii) तमाशबीन किस बात पर वाह-वाह कर रहे थे? (2)

    (iv) बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं परन्तु कई बार भाषा के चक्कर में बात की सरलता गायब हो जाती है। इसका कारण स्पष्ट कीजिए। (2)

    (v) कवि ने बात कहने के लिए कैसी भाषा का प्रयोग किया है? (1)

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  • Question 3

    निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर लगभग 300 शब्दों का निबन्ध लिखिए –

    (क) घर बालक की प्रारम्भिक पाठशाला होती है। माता-पिता प्रथम शिक्षक होते हैं। विद्यालय में शिक्षक ही माता-पिता होते हैं। शिक्षक का दायित्व पढ़ाना तथा सत्यकार्यों के लिए प्रेरणा देना होता है। छात्रों का भी परिवार तथा समाज के प्रति दायित्व होता है। इन तथ्यों के आधार पर छात्र और शिक्षक विषय पर निबन्ध लिखिए।

    (ख) प्रकृति और मानव का सम्बन्ध बहुत गहरा है। सुन्दर प्राकृतिक स्थलों को देखकर मानव को आनंद मिलता है। आपने कुछ समय पूर्व कौन से प्राकृतिक स्थल की यात्रा की। वहाँ जाने का आपको कब और कैसे अवसर मिला। वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन कीजिए।

    (ग) आलसी व्यक्ति ही दैव (भाग्य) का सहारा लेता है। भाग्यवादी निकम्मा होता है तथा विघ्न-बाधाओं का मुकाबला करने से डरता है। ऐसे व्यक्ति निराश, उदासीन और पराश्रित रहते हैं। वस्तुत: परिश्रम ही सौभाग्य का निर्माता है। इन्हीं तथ्यों के आधार पर 'दैव-दैव आलसी पुकारा' विषय पर निबन्ध लिखिए।

     

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  • Question 4

    बाल भवन, उदयपुर के विवेक व्यास की ओर से उसके मित्र के पिता की असामयिक मृत्यु पर एक संवेदना पत्र लिखिए।

    अथवा

    कावेरी छात्रावास के अधीक्षक को अनुराधा की ओर से पत्र लिखकर, छात्रावास की भोजनशाला के निरंतर गिरते स्तर की ओर उनका ध्यान आकृष्ट कीजिए।

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  • Question 5

    निम्नलिखित वाक्यों में प्रयुक्त क्रियाओं के भेद लिखिए –

    (i) लता स्कूल में पढ़ती है।

    (ii) मोहन ने रमेश को पिटवाया।

    (iii) ऊँट दौड़ रहा है।

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  • Question 6

    निर्देशानुसार उत्तर दीजिए – 

    (i) मोहन और राधा एक ही विद्यालय में पढ़ते हैं। (समुच्चयबोधक छाँटिए)

    (ii) मनोहर यहाँ आया था। (क्रिया विशेषण छाँटिए)

    (iii) परीक्षा से पहले खूब पढ़ो। (संबंधबोधक छाँटिए)

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  • Question 7

    निम्नलिखित वाक्यों को मिलाकर सरल, मिश्र तथा संयुक्त वाक्य में बदलिए – 

    (i) मोहन के खेत में गायें चर रही थीं।

    (ii) उसने उन्हें खेत से निकाल दिया।

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  • Question 8

    निर्देशानुसार वाच्य-परिवर्तन कीजिए –

    (i) रीमा से पुस्तक पढ़ी जा रही है। (कर्तृवाच्य में)

    (ii) महर्षि दयानंद ने आर्यसमाज की स्थापना की। (कर्मवाच्य में)

    (iii) मैं उठ नहीं सकता। (भाववाच्य में)

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  • Question 9

    (i) निम्नलिखित समासों का विग्रह करते हुए उनका नाम लिखिए – (2)

        जीवन-मरण, त्रिलोचन

    (ii) निम्नलिखित शब्दों के एकाधिक अर्थ लिखिए – (1)

         पत्र, अक्षर

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  • Question 10

    निम्नलिखित में से किसी एक काव्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए –
    (क) नाथ संभुधनु भंजनिहारा
    होइहि केउ एक दास तुम्हारा।।
    आयेसु काह कहिअ किन मोही।
    सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।
    सेवकु सो जो करै सेवकाई।
    अरिकरनी करि करिअ लराई।।
    सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा।
    सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।
    सो बिलगाउ बिहाइ समाजा।
    न त मारे जैहहिं सब राजा।।
    सुनि मुनिबचन लखन मुसकाने।
    बोले परसुधरहि अवमाने।।
    बहु धनुही तोरी लरिकाईं।
    कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।।
    येहि धनु पर ममता केहि हेतू।
    सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।
    रे नृपबालक कालबस बोलत तोहि न सँभार।
    धनुही सम त्रिपुरारिधनु बिदित सकल संसार।।

    (i) धनुष टूटने के पश्चात परशुराम ने क्या कहा? (2)

    (ii) परशुराम के वचन सुनकर लक्ष्मण क्यों मुसकाए? (2)

    (iii) लक्ष्मण ने परशुराम से क्या कहा? (2)

    अथवा

    (ख) छाया मत छूना
    मन, होगा दुख दूना।
    यश है न वैभव है, मान है न सरमाया;
    जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
    प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है,
    हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है।
    जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन-
    छाया मत छूना
    मन, होगा दुख दूना।

    (i) 'छाया मत छूना' का तात्पर्य स्पष्ट कीजिए? (2)

    (ii) प्रत्येक चंद्रिका में काली रात कैसे छिपी रहती है? (2)

    (iii) व्यक्ति को कठिन यथार्थ का पूजन क्यों करना चाहिए? (2)

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  • Question 11

    निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं तीन का उत्तर दीजिए – (3 + 3 + 3)

    (i) देव कवि ने 'ब्रजदूलह' किसके लिए प्रयुक्त किया है और उन्हें संसार रुपी मंदिर का दीपक क्यों कहा है?

    (ii) 'यह दंतुरित मुसकान' कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में क्या अंतर है?

    (iii) 'कन्यादान' कविता में लड़की की जो छवि आपके सामने उभर कर आती है, उसे शब्द-बद्ध कीजिए।

    (iv) संगतकार किन-किन रुपों में मुख्य गायक-गायिकाओं की मदद करते हैं?

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  • Question 12

    निम्नलिखित काव्यांशों में से किसी एक को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए – 
    (क) भानुबंस राकेस कलंकू।
    निपट निरंकुसु अबुधु असंकू।।
    कालकवलु होइहि छन माहीं।
    कहौं पुकारि खोरि मोहि नाहीं।।
    तुम्ह हटकहु जौ चहहु उबारा।
    कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।।
    लखन कहेउ मुनि सुजसु तुम्हारा।
    तुम्हहि अछत को बरनै पारा।।
    अपने मुहु तुम्ह आपनि करनी।
    बार अनेक भाँति बहु बरनी।।
    नहि संतोषु न पुनि कछु कहहू।
    जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।।
    बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा।
    गारी देत न पावहु सोभा।।

    (i) इन पंक्तियों में किस छन्द का प्रयोग किया गया है? (1)

    (ii) 'निपट निरंकुसु अबुधु असंकू' में किस अलंकार का प्रयोग किया गया है? (1)

    (iii) इन पंक्तियों में किस भाषा का प्रयोग किया गया है? (1)

    (iv) यह पंक्तियाँ हिन्दी साहित्य के किस काल से सम्बन्धित हैं? (1)

    (v) 'जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू' में किस अलंकार का प्रयोग किया गया है? (1)

    अथवा

    (ख) तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
    प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
    आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
    तभी मुख्य गायक को ढाँढ़स बँधाता
    कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर
    कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ

    (i) इन पंक्तियों में किस छन्द का प्रयोग किया गया है? (1)

    (ii) इन पंक्तियों में से कोई दो तत्सम शब्द छाँटकर लिखिए। (1)

    (iii) इन पंक्तियों का सम्बन्ध हिंदी साहित्य के किस काल से है? (1)

    (iv) तीसरी पंक्ति में किस अलंकार का प्रयोग किया गया है? (1)

    (v) मुख्य गायक का स्वर जब धीमा पड़ता है तो संगतकार क्या करता है? (1)

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  • Question 13

    निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक गद्यांश के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

    (क) कार्तिक आया नहीं कि बालगोबिन भगत की प्रभातियाँ शुरु हुईं, जो फागुन तक चला करतीं। इन दिनों वह सबेरे ही उठते। न जाने किस वक्त जगकर वह नदी-स्नान को जाते-गाँव से दो मील दूर! वहाँ से नहा-धोकर लौटते और गाँव के बाहर ही, पोखर के ऊँचे भिंडे पर, अपनी खँजड़ी लेकर जा बैठते और अपने गाने टेरने लगते। मैं शुरु से ही देर तक सोनेवाला हूँ, किंतु, एक दिन, माघ की उस दाँत किटकिटाने वाली भोर में भी, उनका संगीत मुझे पोखरे पर ले गया था। अभी आसमान के तारों के दीपक बुझे नहीं थे। हाँ, पूरब में लोही लग गई थी जिसकी लालिमा को शुक्र तारा और चढ़ा रहा था। खेत, बगीचा, घर-सब पर कुहासा छा रहा था। सारा वातावरण अजीब रहस्य से आवृत मालूम पड़ता था। उस रहस्यमय वातावरण में एक कुश की चटाई पर पूरब मुँह, काली कमली ओढ़े, बालगोबिन भगत अपनी खँजड़ी लिए बैठे थे। उनके मुँह से शब्दों का ताँता लगा था, उनकी अँगुलियाँ खँजड़ी पर लगातार चल रही थीं। गाते-गाते इतने मस्त हो जाते, इतने सुरुर में आते, उत्तेजित हो उठते कि मालूम होता, अब खड़े हो जाएँगे। कमली तो बार-बार सिर से नीचे सरक जाती। मैं जाड़े से कँपकँपा रहा था, किंतु तारों की छाँव में भी उनके मस्तक के श्रमबिंदु, जब-तब चमक ही पड़ते।

    गरमियों में उनकी 'संझा' कितनी उमसभरी शाम को न शीतल करती! अपने घर के आँगन में आसन जमा बैठते। गाँव के उनके कुछ प्रेमी भी जुट जाते। खँजड़ियों और करतालों की भरमार हो जाती। एक पद बालगोबिन भगत कह जाते, उनकी प्रेमी-मंडली उसे दुहराती, तिहराती। धीरे-धीरे स्वर ऊँचा होने लगता-एक निश्चित ताल, एक निश्चित गति से। उस ताल-स्वर के चढ़ाव के साथ श्रोताओं के मन भी ऊपर उठने लगते। धीरे-धीरे मन तन पर हावी हो जाता। होते-होते, एक क्षण ऐसा आता कि बीच में खँजड़ी लिए बालगोबिन भगत नाच रहे हैं और उनके साथ ही सबके तन और मन नृत्यशील हो उठे हैं। सारा आँगन नृत्य और संगीत से ओतप्रोत है।

    (i) बालगोबिन भगत कार्तिक मास में क्या करते थे? (11/2)

    (ii) बालगोबिन के गायन की विशेषताएँ स्पष्ट कीजिए। (11/2)

    (iii) ग्रीष्म ऋतु में शाम के समय बालगोबिन के गायन का श्रोताओं पर क्या प्रभाव पड़ता था? (11/2)

    (iv) 'पूरब में लोही लग गई थी' वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए। (11/2)

    अथवा

    (ख) सो दसवीं कक्षा तक आलम यह था कि बिना किसी खास समझ के घर में होने वाली बहसें सुनती थी और बिना चुनाव किए, बिना लेखक की अहमियत से परिचित हुए किताबें पढ़ती थी। लेकिन सन् 45 में जैसे ही दसवीं पास करके मैं 'फर्स्ट इयर' में आई, हिंदी की प्राध्यापिका शीला अग्रवाल से परिचय हुआ। सावित्री गर्ल्स हाई स्कूल.... जहाँ मैंने ककहरा सीखा, एक साल पहले ही कॉलेज बना था और वे उसी साल नियुक्त हुई थीं, उन्होंने बाकायदा साहित्य की दुनिया में प्रवेश करवाया। मात्र पढ़ने को, चुनाव करके पढ़ने में बदला... खुद चुन-चुनकर किताबें दीं..... पढ़ी हुई किताबों पर बहसें कीं तो दो साल बीतते-न-बीतते साहित्य की दुनिया शरत्-प्रेमचंद से बढ़कर जैनेंद्र, अज्ञेय, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा तक फैल गई और फिर तो फैलती ही चली गई। उस समय जैनेंद्र जी की छोट-छोटे सरल-सहज वाक्यों वाली शैली ने बहुत आकृष्ट किया था। 'सुनीता' (उपन्यास) बहुत अच्छा लगा था, अज्ञेय जी का उपन्यास 'शेखर : एक जीवनी' पढ़ा ज़रुर पर उस समय वह मेरी समझ के सीमित दायरे में समा नहीं पाया था। कुछ सालों बाद 'नदी के द्वीप' पढ़ा तो उसने मन को इस कदर बाँधा कि उसी झोंक में शेखर को फिर से पढ़ गई... इस बार कुछ समझ के साथ। यह शायद मूल्यों के मंथन का युग था..... पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक, सही-गलत की बनी-बनाई धारणाओं के आगे प्रश्नचिह्न ही नहीं लग रहे थे, उन्हें ध्वस्त भी किया जा रहा था। इसी संदर्भ में जैनेंद्र का 'त्यागपत्र', भगवती बाबू का 'चित्रलेखा' पढ़ा और शीला अग्रवाल के साथ लंबी-लंबी बहसें करते हुए उस उम्र में जितना समझ सकती थी, समझा।

    (i) दसवीं कक्षा तक लेखिका का अध्ययन कहाँ तक सीमित था? (2)

    (ii) शीला अग्रवाल का लेखिका पर क्या प्रभाव पड़ा? (2)

    (iii) जैनेंद्र और अज्ञेय के साहित्य ने लेखिका को किस प्रकार प्रभावित किया? (2)

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  • Question 14

    निम्नलिखित में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए – (3 + 3 + 3)

    (i) लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं हैं?

    (ii) 'एक कहानी यह भी' में लेखिका के पिता ने रसोई को 'भटियारखाना' कहकर क्यों संबोधित किया है?

    (iii) स्पष्ट कीजिए कि बिस्मिल्ला खाँ वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इंसान थे।

    (iv) 'संस्कृति' निबंध के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है।

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  • Question 15

    (i) हालदार साहब हमेशा चौराहे पर अपनी गाड़ी क्यों रोकते थे? (3)

    (ii) 'स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं' – कुतर्कवादियों की इस दलील का खंडन द्विवेदी जी ने कैसे किया है, अपने शब्दों में लिखिए। (2)

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  • Question 16

    'साना-साना हाथ जोड़ि' के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को कौन-कौन से दृश्य झकझोर गए?

    अथवा

    आज की पत्रकारिता में चर्चित हस्तियों के पहनावे और खानपान सम्बन्धी आदतों आदि के वर्णन का दौर चल पड़ा हैं। इस प्रकार की पत्रकारिता के बारे में आपके क्या विचार हैं?

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  • Question 17

    निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए – (2 + 2 + 2)

    (i) लोंग-स्टॉक में घूमते चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी क्यों दिखाई दी?

    (ii) दुलारी का टुन्नू से पहली बार परिचय कहाँ और किस रुप में हुआ?

    (iii) भोलानाथ और उसके साथियों के खेल और खेलने की सामग्री आपके खेल और खेलने की सामग्री से किस प्रकार भिन्न हैं?

    (iv) जितेन नार्गे ने लेखिका को खेदुम के विषय में क्या बताया?

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