my game

खेल मनुष्य के जीवन का महत्वपूर्ण अंग है। खेल एक तरफ जहाँ शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखता है, वहीं दूसरी ओर हमारा मनोरंजन भी करता है। हमारे देश में विभिन्न खेल खेले जाते हैं। परन्तु हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल है। हॉकी मेरा भी प्रिय खेल है। यह ऐसा खेल है, जो विश्वभर में खेला जाता है। विश्वभर में इसे अन्य खेलों की भांति लोकप्रियता प्राप्त है। एशिया और यूरोप की खेल प्रतियोगिताओं के साथ-साथ ओलंपिक में भी हॉकी को विशेष स्थान प्राप्त है। हॉकी का एक अन्य रूप आईस हॉकी भी देखने को मिलता है।

विश्व में हॉकी के उद्भव व विकास में मतभेद माना जाता है। एक मत के अनुसार ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व हॉकी का खेल फारस में खेला जाता था। वहाँ से होता हुआ, यह यूनान के ओलंपिक में भी खेला जाने लगा। परन्तु एक मत के अनुसार इसका आरम्भ ईरान से हुआ मानते हैं। भारत में हॉकी का आगमन 1908 में हुआ था। 7 नवम्बर, 1925 को 'अखिल भारतीय हॉकी संघ'की स्थापना हुई थी। इसके बाद 1926 से 1980 तक का काल भारत में हॉकी के स्वर्णिमकाल के रूप में जाना जाता है। हॉकी ही एक ऐसा खेल था, जिसने गुलामी की बेड़ियों में जकड़े भारतीयों को सम्मान से सर उठाने का मौका दिया था। मेजर ध्यान चंद का इसमें मुख्य हाथ रहा है। वह 'हॉकी के जादूगर' कहलाए जाते थे। जर्मनी के शासक हिटलर को ध्यान चंद के खेल ने चमत्कृत कर दिया था। हिटलर इनके खेल से इतना प्रभावित हुआ था कि उसने इन्हें जर्मन नागरिकता और जर्मन सेना में जनरल बना देने की पेशकश की थी। लेकिन ध्यान चंद ने इस पेशकश को विनम्रता से लौटा दिया। ध्यान चंद ऐसे लोगों में से एक थे, जिन्होंने गुलाम भारत को विश्व में विशिष्ट पहचान दिलाई।

इनकी अगुवाई में भारत ने 1928, 1932 और 1936 में ओलंपिक में तीन बार स्वर्ण पदक जीता था। आगे चलकर 1975 में भारत ने विश्वकप जीतने में भी सफलता पाई थी। भारत की हॉकी के लिए यह गर्व की बात थी। हॉकी के इस अभूतपूर्व प्रदर्शन ने हॉकी को भारत का राष्ट्रीय खेल बना दिया। हॉकी ने अपनी विशेषता के कारण प्रत्येक भारतीय के दिल में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया। धनराज पिल्लै ऐसे दूसरे व्यक्ति हैं, जिन्हें हॉकी का प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित खिलाड़ी माना जाता है। इनके प्रयासों के कारण भी हॉकी को लंबे समय तक के लिए जाना जाता है।

हॉकी में प्रत्येक टीम में ग्यारह-ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। इसमें मैदान को दो हिस्सों में बाँटा दिया जाता है। मैदान के दोनों किनारों पर गोल-पोस्ट होते हैं। गोल के सामने डी के आकार का अर्ध गोला बना होता है। इसे 'डी' कहते हैं। इस 'डी' के अंदर बॉल को मारने से यदि बॉल गोल-पोस्ट में चली जाती है, तो गोल माना जाता है। यह खेल 35-35 मिनट की पारियों में खेला जाता है। जो टीम अधिक गोल करती, वह विजयी कहलाती है। मैदान के बीचों-बीच खींची 'सेन्ट्रल रेखा' से इस खेल की शुरुआत होती है। इस खेल में गोल कीपर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। खिलाड़ी, हॉकी की सहायता से बॉल को लेकर आगे बढ़ते हैं और अपनी टीम के लिए गोल करने का प्रयास करते हैं। कुछ रक्षा प्रणाली (डिफेंस) में खड़े रहकर अपने साथी को गोल करने में सहायता करते हैं। उनके विपक्षी अपनी हॉकी से बॉल छिनने का प्रयास करते हैं। उनका यह प्रयास बड़ा आंनदायी होता है। खेल का रोमांच दोनों टीमों के बीच इसी समय देखा जा सकता है। दोनों का यही प्रयास होता है कि सामने वाला गोल न कर पाए।

जब भी यह खेल होना होता है, मैं बड़ी उत्सुकता से इसे देखता हूँ। अपने स्कूल की हॉकी टीम का मैं कप्तान भी हूँ। आज भारत में हॉकी की दुर्दशा देखते ही बनती है। परन्तु मुझे विश्वास है कि यह एक दिन अपना खोया हुआ गौरव फिर से प्राप्त कर स्वयं को उसी प्रतिष्ठा पर दुबारा ला खड़ा करेगी। 

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