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मन्नू भंडारी

प्रश्न-9 निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए- 
आए दिन विभिन्न राजनैतिक पार्टियों के जमावाड़े होते थे और जमकर बहसें होती थीं। बहस करना पिता जी का प्रिय शगल था। चाय-पानी या नाश्ता देने जाती तो पिता जी मुझे भी वहीं बैठने को कहते। वे चाहते थे कि मैं भी वहीं बैठूँ सुनूँ और जानूँ कि देश में चारों ओर क्या कुछ हो रहा है। देश में हो भी कितना कुछ रहा था। सन् 42 के आन्दोलन के बाद से तो सारा देश जैसे खौल रहा था, लेकिन विभिन्न राजनैतिक पार्टियों की नीतियाँ उनके आपसी विरोध या मतभेदों की तो मुझे दूर-दूर तक कोई समझ नहीं थी। हाँ, क्रांतिकारियों और देशभक्त शहीदों के रोमानी आकर्षण, उनकी कुर्बानियों से ज़रूर मन आक्रांत रहता था।

(क) लेखिका के पिता लेखिका को घर में होने वाली बहसों में बैठने के लिए क्यों कहते थे?
(ख) घर के ऐसे वातावरण का लेखिका पर क्या प्रभाव पड़ा?
(ग) देश में उस समय क्या कुछ हो रहा था?
अथवा
संस्कृति के नाम से जिस कूड़े-करकट के ढ़ेर का बोध होता है, वह न संस्कृति है न रक्षणीय वस्तु। क्षण-क्षण परिवर्तन होने वाले संसार में किसी भी चीज़ को पकड़कर बैठा नहीं जा सकता। मानव ने जब-जब प्रज्ञा और मैत्री भाव से किसी नए तथ्य का दर्शन किया है तो उसने कोई वस्तु नहीं देखी है, जिसकी रक्षा के लिए दलबंदियों की ज़रूरत है।
मानव संस्कृति एक अविभाज्य वस्तु है और उसमें जितना अंश कल्याण का है, वह अकल्याणकर की अपेक्षा श्रेष्ठ ही नहीं स्थायी भी है।

(क) लेखक ने किस संस्कृति को संस्कृति नहीं माना है और क्यों?
(ख) प्रज्ञा और मैत्री भाव किस नए तथ्य के दर्शन करवा सकता है और उसकी क्या विशेषता है?
(ग) मानव संस्कृति की विशेषता लिखिए।

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CBSE Board Paper 2015



निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सही उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए।
पर यह पितृ-गाथा मैं इसलिए नहीं गा रही कि मुझे उनका गौरव-गान करना है, बल्कि मैं तो यह देखना चाहती हूँ कि उनके व्यक्तित्व की कौन-सी खूबी और खामियाँ मेरे व्यक्तित्व के ताने-बाने में गुँथी हुई हैं या कि अनजाने-अनचाहे किए उनके व्यवहार ने मेरे भीतर किन ग्रंथियों को जन्म दे दिया। मैं काली हूँ। बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिताजी की कमजोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी खूब गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और उनकी प्रशंसा ने ही, क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीन-भाव की ग्रंथि पैदा नहीं कर दी कि नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पाई? आज भी परिचय करवाते समय जब कोई कुछ विशेषता लगाकर मेरी लेखकीय उपलब्धियों का जिक्र करने लगता है तो मैं संकोच से सिमट ही नहीं जाती बल्कि गड़ने-गड़ने को हो आती हूँ।

(i) लेखिका द्वारा अपने पिता के व्यक्तित्व के विषय में लिखने का उद्देश्य है-
(क) उनका गौरव-गान।
(ख) उनके गुण-दोषों की चर्चा।
(ग) अपने व्यक्तित्व की संरचना में उनका प्रभाव।
(घ) उनके व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों का बखान।

(ii) लेखिका की हीन-भावना का कारण था-
(क) पिताजी का अनजाना-अनचाहा व्यवहार।
(ख) पिताजी का क्रोधी तथा शक्की स्वभाव।
(ग) लेखिका का रूप-रंग तथा बहिन से तुलना।
(घ) गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन।

(iii) लेखिका के मन में उपजी हीन-भावना का क्या परिणाम हुआ?
(क) साहित्यिक चिन्तन बाधित हुआ।
(ख) स्वास्थ्य और गतिविधियाँ प्रभावित हुईं।
(ग) उपलब्धि और प्रतिष्ठा के बाद भी आत्मविश्वास न रहा।
(घ) पिता के प्रति व्यवहार सराहनीय न रहा।

(iv) लेखकीय उपलब्धियों के प्रशंसा के क्षणों में भी लेखिका के अतिशय संकोच का कारण है-
(क) उपलब्धियों की कमी।
(ख) रचनाओं की सदोषता।
(ग) हीन-भावना का प्रभाव।
(घ) विनम्र और संकोची स्वभाव।

(v) ‘उपलब्धि’ का समानार्थक शब्द है-
(क) उपेक्षा
(ख) अपेक्षा
(ग) समाप्ति
(घ) प्राप्ति

अथवा

पढ़ने-लिखने में स्वयं कोई बात ऐसी नहीं जिसमें अनर्थ हो सके। अनर्थ का बीज उसमें हरगिज नहीं। अनर्थ पुरुषों से भी होते हैं। अपढ़ों और पढ़े-लिखों, दोनों से। अनर्थ, दुराचार और पापाचार के कारण और ही होते हैं और वे व्यक्ति-विशेष का चाल-चलन देखकर जाने भी जा सकते हैं। अतएव स्त्रियों को अवश्य पढ़ाना चाहिए।
जो लोग यह कहते हैं कि पुराने जमाने में यहाँ स्त्रियाँ न पढ़ती थीं अथवा उन्हें पढ़ने की मुमानियत थी वे या तो इतिहास से अभिज्ञता नहीं रखते या जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं। समाज की दृष्टि में ऐसे लोग दण्डनीय हैं। क्योंकि स्त्रियों को निरक्षर रखने का उपदेश देना समाज का अपकार और अपराध करना है। समाज कीी उन्नति में बाधा डालना है।

(i) लेखक ‘अनर्थ’ का मूल नहीं मानता है-
(क) पढ़ने-लिखने की उपेक्षा को।
(ख) स्त्री-पुरुष होने को।
(ग) स्त्रियों की पढ़ाई को।
(घ) दुराचार और पापाचार को।

(ii) वे लोग इतिहास की जानकारी नहीं रखते जो कहते हैं कि-
(क) स्त्री शिक्षा समाज की उन्नति में बाधा है।
(ख) पुराने जमाने में स्त्रियाँ नहीं पढ़ती थीं।
(ग) स्त्रियों को जान-बूझकर अनपढ़ रखा जाता था।
(घ) स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अधिकार है।

(iii) ‘अनर्थ’ का तात्पर्य है-
(क) दोषपूर्ण कार्य।
(ख) निन्दनीय कार्य।
(ग) धनरहित कार्य।
(घ) अनुचित कार्य।

(iv) सामाजिक दृष्टि से ऐसे लोग दण्ड के पात्र हैं जो-
(क) स्त्रियों को पढ़ाने की बात करते हैं।
(ख) जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं।
(ग) सामाजिक नियमों की अनदेखी करते हैं।
(घ) समाज की उन्नति में बाधा डालते हैं।

(v) ‘अभिज्ञ’ शब्द का विलोम है-
(क) अज्ञ
(ख) अनभिज्ञ
(ग) सुभिज्ञ
(घ) प्राज्ञ


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CBSE Board Paper 2014



निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सही उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए।
पर यह पितृ-गाथा मैं इसलिए नहीं गा रही कि मुझे उनका गौरव-गान करना है, बल्कि मैं तो यह देखना चाहती हूँ कि उनके व्यक्तित्व की कौन-सी खूबी और खामियाँ मेरे व्यक्तित्व के ताने-बाने में गुँथी हुई हैं या कि अनजाने-अनचाहे किए उनके व्यवहार ने मेरे भीतर किन ग्रंथियों को जन्म दे दिया। मैं काली हूँ। बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिताजी की कमजोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी खूब गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और उनकी प्रशंसा ने ही, क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीन-भाव की ग्रंथि पैदा नहीं कर दी कि नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पाई? आज भी परिचय करवाते समय जब कोई कुछ विशेषता लगाकर मेरी लेखकीय उपलब्धियों का जिक्र करने लगता है तो मैं संकोच से सिमट ही नहीं जाती बल्कि गड़ने-गड़ने को हो आती हूँ।

(i) लेखिका द्वारा अपने पिता के व्यक्तित्व के विषय में लिखने का उद्देश्य है-
(क) उनका गौरव-गान।
(ख) उनके गुण-दोषों की चर्चा।
(ग) अपने व्यक्तित्व की संरचना में उनका प्रभाव।
(घ) उनके व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों का बखान।

(ii) लेखिका की हीन-भावना का कारण था-
(क) पिताजी का अनजाना-अनचाहा व्यवहार।
(ख) पिताजी का क्रोधी तथा शक्की स्वभाव।
(ग) लेखिका का रूप-रंग तथा बहिन से तुलना।
(घ) गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन।

(iii) लेखिका के मन में उपजी हीन-भावना का क्या परिणाम हुआ?
(क) साहित्यिक चिन्तन बाधित हुआ।
(ख) स्वास्थ्य और गतिविधियाँ प्रभावित हुईं।
(ग) उपलब्धि और प्रतिष्ठा के बाद भी आत्मविश्वास न रहा।
(घ) पिता के प्रति व्यवहार सराहनीय न रहा।

(iv) लेखकीय उपलब्धियों के प्रशंसा के क्षणों में भी लेखिका के अतिशय संकोच का कारण है-
(क) उपलब्धियों की कमी।
(ख) रचनाओं की सदोषता।
(ग) हीन-भावना का प्रभाव।
(घ) विनम्र और संकोची स्वभाव।

(v) ‘उपलब्धि’ का समानार्थक शब्द है-
(क) उपेक्षा
(ख) अपेक्षा
(ग) समाप्ति
(घ) प्राप्ति

अथवा

पढ़ने-लिखने में स्वयं कोई बात ऐसी नहीं जिसमें अनर्थ हो सके। अनर्थ का बीज उसमें हरगिज नहीं। अनर्थ पुरुषों से भी होते हैं। अपढ़ों और पढ़े-लिखों, दोनों से। अनर्थ, दुराचार और पापाचार के कारण और ही होते हैं और वे व्यक्ति-विशेष का चाल-चलन देखकर जाने भी जा सकते हैं। अतएव स्त्रियों को अवश्य पढ़ाना चाहिए।
जो लोग यह कहते हैं कि पुराने जमाने में यहाँ स्त्रियाँ न पढ़ती थीं अथवा उन्हें पढ़ने की मुमानियत थी वे या तो इतिहास से अभिज्ञता नहीं रखते या जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं। समाज की दृष्टि में ऐसे लोग दण्डनीय हैं। क्योंकि स्त्रियों को निरक्षर रखने का उपदेश देना समाज का अपकार और अपराध करना है। समाज कीी उन्नति में बाधा डालना है।

(i) लेखक ‘अनर्थ’ का मूल नहीं मानता है-
(क) पढ़ने-लिखने की उपेक्षा को।
(ख) स्त्री-पुरुष होने को।
(ग) स्त्रियों की पढ़ाई को।
(घ) दुराचार और पापाचार को।

(ii) वे लोग इतिहास की जानकारी नहीं रखते जो कहते हैं कि-
(क) स्त्री शिक्षा समाज की उन्नति में बाधा है।
(ख) पुराने जमाने में स्त्रियाँ नहीं पढ़ती थीं।
(ग) स्त्रियों को जान-बूझकर अनपढ़ रखा जाता था।
(घ) स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अधिकार है।

(iii) ‘अनर्थ’ का तात्पर्य है-
(क) दोषपूर्ण कार्य।
(ख) निन्दनीय कार्य।
(ग) धनरहित कार्य।
(घ) अनुचित कार्य।

(iv) सामाजिक दृष्टि से ऐसे लोग दण्ड के पात्र हैं जो-
(क) स्त्रियों को पढ़ाने की बात करते हैं।
(ख) जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं।
(ग) सामाजिक नियमों की अनदेखी करते हैं।
(घ) समाज की उन्नति में बाधा डालते हैं।

(v) ‘अभिज्ञ’ शब्द का विलोम है-
(क) अज्ञ
(ख) अनभिज्ञ
(ग) सुभिज्ञ
(घ) प्राज्ञ


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CBSE Board Paper 2014



निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सही उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए।

पर यह पितृ-गाथा मैं इसलिए नहीं गा रही कि मुझे उनका गौरव-गान करना है, बल्कि मैं तो यह देखना चाहती हूँ कि उनके व्यक्तित्व की कौन-सी खूबी और खामियाँ मेरे व्यक्तित्व के ताने-बाने में गुँथी हुई हैं या कि अनजाने-अनचाहे किए उनके व्यवहार ने मेरे भीतर किन ग्रंथियों को जन्म दे दिया। मैं काली हूँ। बचपन में दुबली और मरियल भी थी। गोरा रंग पिताजी की कमजोरी थी सो बचपन में मुझसे दो साल बड़ी खूब गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन सुशीला से हर बात में तुलना और उनकी प्रशंसा ने ही, क्या मेरे भीतर ऐसे गहरे हीन-भाव की ग्रंथि पैदा नहीं कर दी कि नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा पाने के बावजूद आज तक मैं उससे उबर नहीं पाई? आज भी परिचय करवाते समय जब कोई कुछ विशेषता लगाकर मेरी लेखकीय उपलब्धियों का जिक्र करने लगता है तो मैं संकोच से सिमट ही नहीं जाती बल्कि गड़ने-गड़ने को हो आती हूँ।


(i) लेखिका द्वारा अपने पिता के व्यक्तित्व के विषय में लिखने का उद्देश्य है-
(क) उनका गौरव-गान।
(ख) उनके गुण-दोषों की चर्चा।
(ग) अपने व्यक्तित्व की संरचना में उनका प्रभाव।
(घ) उनके व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों का बखान।

(ii) लेखिका की हीन-भावना का कारण था-
(क) पिताजी का अनजाना-अनचाहा व्यवहार।
(ख) पिताजी का क्रोधी तथा शक्की स्वभाव।
(ग) लेखिका का रूप-रंग तथा बहिन से तुलना।
(घ) गोरी, स्वस्थ और हँसमुख बहिन।

(iii) लेखिका के मन में उपजी हीन-भावना का क्या परिणाम हुआ?
(क) साहित्यिक चिन्तन बाधित हुआ।
(ख) स्वास्थ्य और गतिविधियाँ प्रभावित हुईं।
(ग) उपलब्धि और प्रतिष्ठा के बाद भी आत्मविश्वास न रहा।
(घ) पिता के प्रति व्यवहार सराहनीय न रहा।

(iv) लेखकीय उपलब्धियों के प्रशंसा के क्षणों में भी लेखिका के अतिशय संकोच का कारण है-
(क) उपलब्धियों की कमी।
(ख) रचनाओं की सदोषता।
(ग) हीन-भावना का प्रभाव।
(घ) विनम्र और संकोची स्वभाव।

(v) ‘उपलब्धि’ का समानार्थक शब्द है-
(क) उपेक्षा
(ख) अपेक्षा
(ग) समाप्ति
(घ) प्राप्ति

अथवा

पढ़ने-लिखने में स्वयं कोई बात ऐसी नहीं जिसमें अनर्थ हो सके। अनर्थ का बीज उसमें हरगिज नहीं। अनर्थ पुरुषों से भी होते हैं। अपढ़ों और पढ़े-लिखों, दोनों से। अनर्थ, दुराचार और पापाचार के कारण और ही होते हैं और वे व्यक्ति-विशेष का चाल-चलन देखकर जाने भी जा सकते हैं। अतएव स्त्रियों को अवश्य पढ़ाना चाहिए।
जो लोग यह कहते हैं कि पुराने जमाने में यहाँ स्त्रियाँ न पढ़ती थीं अथवा उन्हें पढ़ने की मुमानियत थी वे या तो इतिहास से अभिज्ञता नहीं रखते या जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं। समाज की दृष्टि में ऐसे लोग दण्डनीय हैं। क्योंकि स्त्रियों को निरक्षर रखने का उपदेश देना समाज का अपकार और अपराध करना है। समाज कीी उन्नति में बाधा डालना है।

(i) लेखक ‘अनर्थ’ का मूल नहीं मानता है-
(क) पढ़ने-लिखने की उपेक्षा को।
(ख) स्त्री-पुरुष होने को।
(ग) स्त्रियों की पढ़ाई को।
(घ) दुराचार और पापाचार को।

(ii) वे लोग इतिहास की जानकारी नहीं रखते जो कहते हैं कि-
(क) स्त्री शिक्षा समाज की उन्नति में बाधा है।
(ख) पुराने जमाने में स्त्रियाँ नहीं पढ़ती थीं।
(ग) स्त्रियों को जान-बूझकर अनपढ़ रखा जाता था।
(घ) स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अधिकार है।

(iii) ‘अनर्थ’ का तात्पर्य है-
(क) दोषपूर्ण कार्य।
(ख) निन्दनीय कार्य।
(ग) धनरहित कार्य।
(घ) अनुचित कार्य।

(iv) सामाजिक दृष्टि से ऐसे लोग दण्ड के पात्र हैं जो-
(क) स्त्रियों को पढ़ाने की बात करते हैं।
(ख) जान-बूझकर लोगों को धोखा देते हैं।
(ग) सामाजिक नियमों की अनदेखी करते हैं।
(घ) समाज की उन्नति में बाधा डालते हैं।

(v) ‘अभिज्ञ’ शब्द का विलोम है-
(क) अज्ञ
(ख) अनभिज्ञ
(ग) सुभिज्ञ
(घ) प्राज्ञ


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CBSE Board Paper 2014



निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित प्रश्नों के सही उत्तर वाले विकल्प चुनकर लिखिए:
उस समय तक हमारे परिवार में लड़की के विवाह के लिए अनिवार्य योग्यता थी-
उम्र में सोलह वर्ष और शिक्षा में मैट्रिक। सन् ’44 में सुशीला ने यह योग्यता प्राप्त की और शादी करके कोलकाता चली गई। दोनों बड़े भाई भी आगे पढ़ाई के लिए बाहर चले गए। इन लोगों की छत्र-छाया के हटते ही पहली बार मुझे नए सिरे से अपने वज़ूद का एहसास हुआ। पिताजी का ध्यान भी पहली बार मुझ पर केन्द्रित हुआ। लड़कियों को जिस उम्र में स्कूली शिक्षा के साथ-साथ सुघड़ गृहिणी और कुशल पाक-शास्त्री बनने के नुस्खे जुटाए जाते थे, पिताजी का आग्रह रहता था कि मैं रसोई से दूर ही रहूँ। रसोई को वे भटियारखाना कहते थे और उनके हिसाब से वहाँ रहना अपनी क्षमता और प्रतिभा को भट्टी में झोंकना था।

(i) लड़की की वैवाहिक योग्यता से सिद्ध होती है, उस परिवार की:
(क) स्वतंत्र विचारधारा
(ख) परम्परावादी मान्यता
(ग) पाश्चात्य विचारधारा
(घ) अत्याधुनिक सोच

(ii) बड़े बहन-भाई के परिवार से जाने के बाद:
(क) परिवार में लेखिका का महत्व बढ़ गया
(ख) माता-पिता से अधिक प्यार मिलने लगा
(ग) लेखिका को अपने अस्तित्व का बोध हुआ
(घ) लेखिका को पाक-शास्त्र पढ़ाया जाने लगा

(iii) लेखिका के पाक-शास्त्री बनने के विषय में पिताजी का मानना था-
(क) पाक-क्रिया की कुशलता से लड़की सुघड़ गृहिणी बनती है
(ख) विवाह के उपरान्त ससुराल में उसकी सराहना होती है
(ग) उसका गृहस्थ सदा सुखी और स्वस्थ रहता है
(घ) रसोई के काम से लड़की की योग्यता और प्रतिभा कुंद हो जाती है

(iv) ‘पिताजी का आग्रह था कि मैं रसोई से दूर ही रहूँ’ – वाक्य का प्रकार है-
(क) सरल
(ख) संयुक्त
(ग) मिश्र
(घ) साधारण
 

(v) ‘इन लोगों की छत्रछाया हटते ही’ कथन में  ‘इन लोगों’ से तात्पर्य है-
(क) क्षमता और प्रतिभा
(ख) भाई-बहिन
(ग) माता-पिता
(घ) सखी-सहेली

अथवा

मसलन बिस्मिल्ला खाँ की उम्र अभी 14 साल है। वही काशी है। वही पुराना बालाजी का मंदिर जहाँ बिस्मिल्ला खाँ को नौबतखाने रियाज़ के लिए जाना पड़ता है। मगर एक रास्ता है बालाजी मंदिर तक जाने का। यह रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाता है। इस रास्ते से अमीरुद्दीन को जाना अच्छा लगता है। इस रास्ते न जाने कितने तरह को बोल-बनाव, कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा के मार्फत ड्योढ़ी तक पहुँचते रहते हैं। रसूलन और बतूलन जब गाती हैं तब अमीरुद्दीन को खुशी मिलती है। अपने ढेरों साक्षात्कारों में बिस्मिल्ला खाँ साहब ने स्वीकार किया है कि उन्हें अपने जीवन के आरम्भिक दिनों में संगीत के प्रति आसक्ति इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर मिली है। एक प्रकार से उनकी अबोध उम्र में अनुभव की स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वर्णमाला रसूलबाई और बतूलनबाई ने उकेरी है।

(i) बिस्मिल्ला खाँ का मूल नाम है-
(क) सादिक हुसैन
(ख) शम्सुद्दीन
(ग) अमीरुद्दीन
(घ) अलीबख्श

(ii) बिस्मिल्ला खाँ को बालाजी मन्दिर जाने के लिए एक खास रास्ता ही क्यों पंसद था?
(क) वह रास्ता छोटा था
(ख) उस रास्ते पर उनके मित्रों के घर थे
(ग) उस रास्ते पर दो बहिनों का गायन सुनने को मिलता था
(घ) उन्हें ठुमरी, टप्पा, दादरा पंसद था।

(iii) कैसे कहा जा सकता है कि उन्हें संगीत की प्रेरणा इन दोनों बहिनों से मिली?
(क) इनका गायन बहुत उत्कृष्ट था
(ख) यह गायन प्राय: उन्हें सुनने को मिलता था
(ग) इस गायन के प्रति आसक्ति को उन्होंने स्वीकार किया है
(घ) इस गायन में एक विशेष मोहकता थी।

(iv) संगीत का एक रुप नहीं है-
(क) शहनाई
(ख) टप्पा
(ग) ठुमरी
(घ) दादरा
 
(v) ‘रसूलन और बतूलन जब गाती हैं तब अमीरुद्दीन को खुशी मिलती है’- वाक्य का प्रकार है-
(क) सरल
(ख) संयुक्त
(ग) मिश्र
(घ) साधारण

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CBSE Board Paper 2013



निम्नलिखित गद्यांशों को पढ़कर किसी एक पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

(क) और शायद गिरती आर्थिक स्थिति ने ही उनके व्यक्तित्व के सारे सकारात्मक पहलुओं को निचोड़ना शुरू कर दिया। सिकुड़ती आर्थिक स्थिति के कारण और अधिक विस्फारित उनका अहं उन्हें इस बात तक की अनुमति नहीं देता था कि वे कम-से-कम अपने बच्चों को तो अपनी आर्थिक विवशताओं का भागीदार बनाएँ। नवाबी आदतें, अधूरी महत्त्वकांक्षाएँ, हमेशा शीर्ष पर रहने के बाद हाशिये पर सरकते चले जाने की यातना क्रोध बनकर हमेशा माँ को काँपती-थरथराती रहती थी। अपनों के हाथों विश्वासघात की जाने कैसी गहरी चोटें होंगी, जिन्होंने आँख मूँदकर सबका विश्वास करने वाले पिता को बाद के दिनों में इतना शक्की बना दिया था कि जब-तब हम लोग भी उनकी चपेट में आते ही रहते।

(i) आशय स्पष्ट कीजिए –'सकारात्मक पहलुओं को निचोड़ना शुरू कर दिया'। (2)

(ii)लेखिका के पिता अपनी विवशताओं को अपने परिवार के सामने भी स्पष्ट क्यों नहीं कर पाते थे? (2)

(iii) लेखिका के अनुसार जीवन के अंतिम दिनों में पिता के बहुत अधिक शक्की बन जाने के क्या कारण थे? (2)


(ख) फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है। उनको देखना करूणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था और उनसे बता करना कर्म के संकल्प से भरना था। मुझे 'परिमल' के वे दिन याद आते हैं जब हम सब एक पारिवारिक रिश्ते में बँधे जैसे थे, जिसके बड़े फ़ादर बुल्के थे। हमारे हँसी-मज़ाक में वह निर्लिप्त शामिल रहते, हमारी गोष्ठियों में वह गंभीर बहस करते, हमारी रचनाओं पर बेबाक राय और सुझाव देते और हमारे घरों के किसी भी उत्सव और संस्कार में वह बड़े भाई और पुरोहित जैसे खड़े हो हमें अपने आशीषों से भर देते।

(i) आशय स्पष्ट कीजिए – (2)

'उनको देखना करूणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था और उनसे बात करना कर्म के संकल्प से भरना था।'

(ii) लेखक फ़ादर कामिल बुल्के से संबंधित किन-किन मधुर स्मृतियों में खो जाता है? (2)

(iii) उपर्युक्त पंक्तियों से फ़ादर के व्यक्तित्व की कौन-सी दो सर्वाधिक प्रमुख विशिष्टताएँ स्पष्ट होती हैं? संक्षेप में लिखिए। (2)
 


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CBSE Board Paper 2008



निम्नलिखित में से किसी एक गद्यांश के नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

(क) पर यह सब तो मैंने केवल सुना। देखा, तब तो इन गुणों के भग्नावशेषों को ढोते पिता थे। एक बहुत बड़े आर्थिक झटके के कारण वे इंदौर से अजमेर आ गए थे, जहाँ उन्होंने अपने अकेले के बल-बूते और हौसले से अंग्रेज़ी-हिंदी शब्दकोश (विषयवार) के अधूरे काम को आगे बढ़ाना शुरू किया जो अपनी तरह का पहला और अकेला शब्दकोश था। इसने उन्हें यश और प्रतिष्ठा तो बहुत दी, पर अर्थ नहीं और शायद गिरती आर्थिक स्थिति ने ही उनके व्यक्तित्व के सारे सकारात्मक पहलुओं को निचोड़ना शुरू कर दिया। सिकुड़ती आर्थिक स्थिति के कारण और अधिक विस्फारित उनका अहं उन्हें इस बात तक की अनुमति नहीं देता था कि वे कम-से-कम अपने बच्चों को तो अपनी आर्थिक विवशताओं का भागीदार बनाएँ। नवाबी आदतें, अधूरी महत्त्वकांक्षाएँ, हमेशा शीर्ष पर रहने के बाद हाशिए पर सरकते चले जाने की यातना क्रोध बनकर हमेशा माँ को कँपाती-थरथराती रहती थी। अपनों के हाथों विश्वासघात की जाने कैसी गहरी चोटें होंगी वे, जिन्होंने आँख मूँदकर सबका विश्वास करने वाले पिता को बाद के दिनों में इतना शक्की बना दिया था कि जब-तब हम लोग भी उसकी चपेट में आते ही रहते।

(i) लेखिका के पिता को इन्दौर से अजमेर क्यों आना पड़ा? (2)

(ii) लेखिका की माता किस कारण भयभीत रहती थी? (2)

(iii) लेखिका के पिता के स्वभाव में संदेह की भावना क्यों बढ़ गई थी? (2)

अथवा

(ख) मान लीजिए कि पुराने जमाने में भारत की एक भी स्त्री पढ़ी-लिखी न थी। न सही। उस समय स्त्रियों को पढ़ाने की ज़रूरत न समझी गई होगी। पर अब तो है। अतएव पढ़ाना चाहिए। हमने सैंकड़ों पुराने नियमों, आदेशों, और प्रणालियों को तोड़ दिया है या नहीं? तो, चलिए, स्त्रियों को अपढ़ रखने की इस पुरानी चाल को भी तोड़ दें। हमारी प्रार्थना तो यह है कि स्त्री-शिक्षा के विपक्षियों को क्षणभर के लिए भी इस कल्पना को अपने मन में स्थान न देना चाहिए कि पुराने ज़माने में यहाँ की सारी स्त्रियाँ अपढ़ थीं अथवा उन्हें पढ़ने की आज्ञा न थी। जो लोग पुराणों में पढ़ी-लिखी स्त्रियों के हवाले माँगते हैं उन्हें श्रीमद्भागवत, दशमस्कंध के उत्तरार्द्ध का त्रेपनवाँ अध्याय पढ़ना चाहिए। उसमें रूक्मिणी-हरण की कथा है। रूक्मिणी ने जो एक लंबा-चौड़ा पत्र एकांत में लिखकर, एक ब्राह्मण के हाथ, श्रीकृष्ण को भेजा था वह तो प्राकृत में न था। उसके प्राकृत में होने का उल्लेख भागवत में तो नहीं। उसमें रूक्मिणी ने जो पांडित्य दिखाया है वह उसके अपढ़ और अल्पज्ञ होने अथवा गँवारपन का सूचक नहीं। पुराने ढंग के पक्के सनातन धर्मावलंबियों की दृष्टि में तो नाटकों की अपेक्षा भागवत का महत्त्व बहुत ही अधिक होना चाहिए। इस दशा में यदि उनमें से कोई यह कहे कि सभी प्राचीनकालीन स्त्रियाँ अपढ़ होती थीं तो उसकी बात पर विश्वास करने की ज़रूरत नहीं। भागवत की बात यदि पुराणकार या कवि की कल्पना मानी जाए तो नाटकों की बात उससे भी गई-बीती समझी जानी चाहिए।

(i) लेखक स्त्रियों को शिक्षा देना क्यों आवश्यक समझता है? (2)

(ii) पुराणों में स्त्रियों के शिक्षित होने का प्रमाण कहाँ मिलता है? (2)

(iii) क्या आप इस बात से सहमत हैं कि प्राचीन-काल में सभी स्त्रियाँ अशिक्षित होती थीं? (2)


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CBSE Board Paper 2005



पाठ्य-पुस्तक के आधार पर निम्नलिखित गद्यांशों में से किसी एक को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए –

(क) शीला अग्रवाल ने साहित्य का दायरा ही नहीं बढ़ाया था, बल्कि घर की चारदीवारी के बीच बैठकर देश की स्थितियों को जानने-समझने का जो सिलसिला पिताजी ने शुरू किया था, उन्होंने वहाँ से खींचकर उसे भी स्थितियों की सक्रिय भागीदारी में बदल दिया। सन् 46-47 के दिन...... वे स्थितियाँ, उसमें वैसे भी घर में बैठे रहना संभव था भला? प्रभात-फेरियाँ, हड़तालें, जुलूस, भाषण हर शहर का चरित्र था और पूरे दमखम और जोश-खरोश के साथ इन सबसे जुड़ना हर युवा का उन्माद। मैं भी युवा थी और शीला अग्रवाल की जोशिली बातों ने रगों में बहते खून को लावे में बदल दिया था। स्थिति यह हुई कि एक बवंडर शहर में मचा हुआ था और एक घर में। पिताजी की आज़ादी की सीमा यहीं तक थी कि उनकी उपस्थिति में घर में आए लोगों के बीच उठूँ-बैठूँ, जानूँ-समझूँ। हाथ उठा-उठाकर नारे लगाती, हड़तालें करवाती, लड़कों के साथ शहर की सड़कें नापती लड़की को अपनी सारी आधुनिकता के बावजूद बर्दाश्त करना उनके लिए मुश्किल हो रहा था तो किसी की दी हुई आज़ादी के दायरे में चलना मेरे लिए। जब रगों में लहू की जगह लावा बहता हो तो सारे निषेध, सारी वर्जनाएँ और सारा भय कैसे ध्वस्त हो जाता है, यह तभी जाना और अपने क्रोध से सबको थरथरा देने वाले पिताजी से टक्कर लेने का जो सिलसिला तब शुरू हुआ था, राजेन्द्र से शादी की, तब तक वह चलता ही रहा।

(i) सन् 46-47 में लेखिका के लिए घर बैठे रहना संभव क्यों नहीं था? (2)

(ii) पिताजी अपनी बेटी को किस सीमा तक स्वतंत्रता देना चाहते थे? (2)

(iii) पिताजी के लिए अपनी बेटी को बर्दाश्त करना मुश्किल क्यों हो रहा था? (2)

अथवा

(ख) शहनाई के इसी मंगलध्वनि के नायक बिस्मिल्ला खाँ साहब अस्सी बरस से सुर माँग रहे हैं। सच्चे सुर की नेमत। अस्सी बरस की पाँचों वक्त वाली नमाज़ इसी सुर को पाने की प्रार्थना में खर्च हो जाती है। लाखों सज़दे, इसी एक सच्चे सुर की इबादत में खुदा के आगे झुकते हैं। वे नमाज़ के बाद सज़दे में गिड़गिड़ाते हैं - 'मेरे मालिक एक सुर बख्श दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।' उनको यकीन है, कभी खूदा यूँ ही उन पर मेहरबान होगा और अपनी झोली से सुर का फल निकालकर उनकी ओर उछालेगा, फिर कहेगा, ले जा अमीरूद्यीन इसको खा ले और कर ले अपनी मुराद पूरी।

(i) बिस्मिल्ला खाँ बरसों से पाँचों वक्त की नमाज़ के पश्चात् क्या प्रार्थना करते हैं? (2)

(ii) बिस्मिल्ला खाँ सुर को इतना महत्त्वपूर्ण क्यों मानते हैं? (2)

 (iii) बिस्मिल्ला खाँ को किस बात का यकीन है? (2)


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CBSE Board Paper 2002



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